तलाक और गुजारा भत्ते से जुड़े मामलों पर अक्सर सोशल मीडिया पर बहस छिड़ जाती है, लेकिन इस बार चर्चा का केंद्र पुणे का एक कथित मामला बन गया है। वायरल पोस्ट में किए गए एक दावे ने लोगों को हैरान कर दिया, जिसके बाद हजारों यूजर्स अपनी-अपनी राय देने लगे। मामला कमाई, मेंटेनेंस और वैवाहिक अधिकारों से जुड़ा बताया जा रहा है। कुछ लोग इसे न्यायसंगत मान रहे हैं, तो कुछ इसे लेकर सवाल उठा रहे हैं। यही वजह है कि यह पोस्ट तेजी से वायरल हो रही है और इंटरनेट पर बहस का नया विषय बन गई है।
वायरल पोस्ट के मुताबिक, पुणे के एक दंपति की शादी के महज छह महीने बाद ही रिश्ते में गंभीर समस्याएं आ गईं। दोनों नौकरीपेशा थे, उन्होंने तलाक का फैसला किया। पोस्ट में दावा किया गया कि पति की मासिक इन-हैंड सैलरी 2,79,499 रुपये थी, जबकि पत्नी हर महीने 1,41,436 रुपये घर लेकर आती थी।
मेंटेनेंस को लेकर क्या किया गया दावा?
पोस्ट में कहा गया कि पति अपने माता-पिता की आर्थिक जिम्मेदारी भी निभा रहा था। इसके बावजूद पत्नी ने अदालत में यह तर्क दिया कि उसे वैसा ही जीवन स्तर बनाए रखने का अधिकार है जैसा वह शादी के दौरान जी रही थी। वायरल दावे के अनुसार, अदालत ने पति को हर महीने 1,35,000 रुपये मेंटेनेंस देने का निर्देश दिया।
गणित जिसने लोगों को चौंका दिया
पोस्ट में साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, मेंटेनेंस मिलने के बाद पत्नी की कुल मासिक आय 2,76,436 रुपये तक पहुंच जाती है। वहीं पति के पास हर महीने 1,44,499 रुपये बचते हैं। यही आंकड़े सोशल मीडिया पर बहस का सबसे बड़ा कारण बन गए।
टैक्स को लेकर भी उठे सवाल
वायरल पोस्ट में यह भी दावा किया गया कि पति इस मेंटेनेंस राशि पर कोई टैक्स छूट नहीं ले पाएगा, क्योंकि आयकर नियमों के तहत इसे व्यक्तिगत खर्च माना जाता है। यानी उसे अपनी पूरी सैलरी पर टैक्स देना होगा, जिसमें वह राशि भी शामिल होगी जो वह मेंटेनेंस के रूप में चुका रहा है।
सोशल मीडिया पर बंटी लोगों की राय
जैसे ही यह पोस्ट वायरल हुई, एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई। कई यूजर्स ने सवाल उठाया कि यदि महिला पहले से अच्छी आय अर्जित कर रही है तो इतनी बड़ी मेंटेनेंस राशि का क्या मतलब है। कुछ लोगों ने फैसले की आलोचना की, जबकि कुछ ने कानून और न्याय व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए।
दूसरी तरफ भी सामने आई राय
हालांकि सभी लोग इस दावे के विरोध में नहीं थे। कुछ यूजर्स का कहना था कि ऐसे मामलों की वजह से गुजारा भत्ते के असली उद्देश्य को गलत तरीके से पेश किया जाता है। उनका मानना था कि मेंटेनेंस कानून जरूरतमंद लोगों को न्याय दिलाने के लिए बनाए गए हैं, न कि किसी एक पक्ष को अनुचित लाभ पहुंचाने के लिए।
दावे की सत्यता पर नहीं हुई पुष्टि
ध्यान देने वाली बात यह है कि सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे इस मामले की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है। पोस्ट में दी गई जानकारी को लेकर बहस जरूर जारी है, लेकिन अदालत के आदेश और उससे जुड़े सभी तथ्यों की आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है।