तीस्ता नदी की तेज धारा में एक नन्हा हाथी जिंदगी के लिए संघर्ष कर रहा था। झुंड से बिछड़कर वह कई किलोमीटर तक बह गया और हर पल उसकी जान पर खतरा मंडरा रहा था। तभी नदी में मछली पकड़ रहे मछुआरों की नजर उस पर पड़ी। बिना देर किए उन्होंने अपनी नावें हाथी के बच्चे की ओर मोड़ दीं। उफनती लहरों और तेज बहाव के बीच करीब चार किलोमीटर तक उसका पीछा किया गया। आखिरकार मछुआरों ने अपनी जान जोखिम में डालकर बच्चे को सुरक्षित बाहर निकाल लिया। लेकिन इसके बाद उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी, उसे उसकी मां से मिलाना।
चार किलोमीटर तक मौत से लड़ते रहे मछुआरे
घटना जलपाईगुड़ी की है। गजोल्डोबा बैराज से पानी छोड़े जाने के बाद तीस्ता नदी का बहाव तेज था। इसी दौरान हाथियों का एक झुंड अपलचंद जंगल की काथांबारी रेंज के पास नदी पार कर रहा था। तेज धारा में नन्हा हाथी अपनी मां और झुंड से अलग हो गया। नॉर्थ बंगाल फिशरमेन फोरम से जुड़े मछुआरे नदी में मौजूद थे, तभी उन्हें बच्चे के चिंघाड़ने की आवाज सुनाई दी। पानी में संघर्ष करते बच्चे को देखकर उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना नाव उसकी ओर मोड़ दी।
लहरों को चीरकर बच्चे तक पहुंची नाव
मछुआरों ने करीब चार किलोमीटर तक बच्चे का पीछा किया। हर पल डर था कि कहीं तेज धारा उसे और दूर न ले जाए। बच्चा लगातार सांस लेने के लिए संघर्ष कर रहा था। आखिरकार तीन मछुआरे नदी में उतर गए और किसी तरह बच्चे को खींचकर नाव पर चढ़ाने में कामयाब हुए। इसके बाद भी चुनौती खत्म नहीं हुई।
जब नाव को वापस किनारे की ओर ले जाया जाने लगा, तब तीनों मछुआरे उसके साथ-साथ पानी में तैरते रहे। तेज धारा के खिलाफ संघर्ष करते हुए उन्होंने नाव और नन्हे हाथी को सुरक्षित किनारे तक पहुंचाने में मदद की। बच्चे को तुरंत वन विभाग को सौंप दिया गया। काठांबारी रेंज कार्यालय में उसकी जांच की गई और उसे जरूरी पशु चिकित्सा दी गई।
अब सबसे बड़ी तलाश थी मां की
बच्चे की जान बचने के बाद वन विभाग के सामने अगली चुनौती थी उसे उसकी मां तक पहुंचाना। बैकुंठपुर वन प्रभाग की टीम ने हाथियों के झुंड की तलाश शुरू की। करीब दो घंटे तक वनकर्मी, स्थानीय लोग और मछुआरे मिलकर प्रयास करते रहे। आखिरकार बच्चे को तीस्ता के उस हिस्से में ले जाया गया, जहां हाथियों के झुंड के होने की संभावना थी। कुछ ही देर में हथनी अपने बच्चे के पास पहुंच गई। सबसे भावुक पल तब आया, जब मां ने अपने बच्चे को स्वीकार किया और उसे दूध पिलाते हुए देखा गया।
एक बचाव, जिसने पूरी कहानी बदल दी
बैकुंठपुर के DFO मुदित ने मछुआरों की तत्परता की सराहना की। उनके मुताबिक, मां और बच्चे का मिलना बेहद महत्वपूर्ण था, क्योंकि लंबे समय तक इंसानी संपर्क में रहने वाले हाथी के बच्चों को कभी-कभी झुंड दोबारा स्वीकार नहीं करता। इस बार पांच मछुआरों की हिम्मत, वन विभाग की कोशिश और स्थानीय लोगों के सहयोग ने एक नन्ही जिंदगी को उसकी मां की गोद वापस दिला दी।