वैज्ञानिकों और जीवविज्ञानियों के लिए हमेशा से पहेली बना रहने वाला नेकेड मोल रैट का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। एक्स (X) पर Massimo नाम के एक हैंडल ने इस अजीबोगरीब चूहे का एक वीडियो साझा किया गया है। इस वीडियो को कोट कर इंडियन फॉरेस्ट सर्विस (IFS) ऑफिसर हिमांशु त्यागी ने इस अजीबोगरीब चूहे के बारे में रोचक जानकारियां साझा की हैं।
इस वीयर्ड चूहे की अनोखी शारीरिक बनावट और इसकी लंबी उम्र के वैज्ञानिक रहस्यों को लेकर हिमांशु त्यागी ने भी एक बेहद दिलचस्प एक्सप्लेनेशन साझा किया है। इसे जानने से पहले आप यहां नीचे पहले इसका वीडियो देखिए-
इंसानी नियमों को चुनौती: उम्र 37 साल, लेकिन हमेशा जवां
IFS हिमांशु त्यागी ने नेकेड मोल रैट और इंसानों की तुलना करते हुए इसके उम्र बढ़ने के अनोखे विज्ञान को समझाया है। सामान्य तौर पर इंसानों में वयस्क होने के बाद हर 8 साल में मौत का खतरा लगभग दोगुना हो जाता है। लेकिन नेकेड मोल रैट उम्र बढ़ने के इस प्राकृतिक नियम को पूरी तरह से धता बता देता है। जहां आकार में इसके बराबर रहने वाले सामान्य घरेलू चूहे सिर्फ 3 से 4 साल तक ही जीवित रह पाते हैं, वहीं नेकेड मोल रैट 37 साल तक जिंदा रह सकता है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इतनी लंबी उम्र होने के बावजूद इनके दिल का स्वास्थ्य, हड्डियां और इनका मेटाबॉलिज्म (पाचन तंत्र) बुढ़ापे में भी बिल्कुल वैसा ही रहता है जैसा एक युवा चूहे का होता है। यानी उम्र के साथ इनके शरीर में किसी भी तरह की गिरावट या कमजोरी देखने को नहीं मिलती।
बिना ऑक्सीजन 18 मिनट तक जीवित रहने का महा-विज्ञान
हम इंसान या अन्य स्तनधारी जीव ऑक्सीजन की कमी वाले वातावरण में कुछ ही मिनटों के भीतर दम तोड़ देते हैं, क्योंकि हमारा दिमाग बिना ऑक्सीजन के जीवित नहीं रह सकता। IFS के मुताबिक नेकेड मोल रैट पूरी तरह से जीरो-ऑक्सीजन (शून्य ऑक्सीजन) वाली परिस्थितियों में भी 18 मिनट तक मजे से जिंदा रह सकता है। ऐसा करने के लिए वे अपने शरीर में दो बड़े बदलाव करते हैं। जैसे ही ऑक्सीजन खत्म होती है, ये चूहे अपने दिल की धड़कन को सामान्य रफ्तार यानी करीब 200 बीपीएम (BPM) से घटाकर 50 बीपीएम से भी कम पर ले आते हैं। ऑक्सीजन की कमी होने पर ये अपनी ऊर्जा के प्राथमिक स्रोत को ग्लूकोज से बदलकर फ्रक्टोज पर शिफ्ट कर लेते हैं, जिससे इनके अंगों को बिना ऑक्सीजन के भी ऊर्जा मिलती रहती है।
कैंसर के प्रति इनकी अविश्वसनीय प्रतिरोधक क्षमता इन्हें प्रकृति में विकासवादी अनुकूलन की आखिरी सीमाओं को पार करने वाला जीव बनाती है। वैज्ञानिक अब इस छोटे से जीव के जीन्स और शरीर पर रिसर्च कर रहे हैं ताकि इंसानों के लिए भी बुढ़ापे और कैंसर से लड़ने के नए रास्ते तलाशे जा सकें।