क्या आज बदल जाएगा पूरी दुनिया का नक्शा? UN में 450 साल पुरानी व्यवस्था पर बड़ी वोटिंग, जानिए मर्केटर मैप का पूरा विवाद
World Map Controversy: संयुक्त राष्ट्र महासभा में आज दुनिया का नया नक्शा अपनाने को लेकर ऐतिहासिक वोटिंग हो रही है। अफ्रीकी संघ की अगुवाई में 1569 के 'मर्केटर मैप' को हटाने की मांग की गई है, जिस पर अफ्रीका जैसे बड़े महाद्वीप को छोटा और यूरोप-ग्रीनलैंड को बहुत बड़ा दिखाया गया है। असलियत में अफ्रीका ग्रीनलैंड से 14 गुना बड़ा है। जानिए अगर 'Equal Earth' मैप का प्रस्ताव पास हुआ तो स्कूलों से लेकर गूगल मैप्स तक क्या-क्या बदल जाएगा
अफ्रीकी देश टोगो की अगुवाई में और 55 देशों वाले अफ्रीकी संघ के समर्थन से यह प्रस्ताव लाया गया है
UN Map Voting Controversy: क्या आपने कभी सोचा है कि जिस दुनिया के नक्शे को हम बचपन से स्कूलों, किताबों और गूगल मैप्स पर देखते आ रहे हैं, वह असल में सही है ही नहीं? संयुक्त राष्ट्र महासभा में आज एक ऐसे मसौदे पर ऐतिहासिक वोटिंग होने जा रही है, जो 450 साल पुरानी नक्शा प्रणाली को बदलकर पूरी दुनिया का भूगोल देखने का जरिया ही बदल सकती है।
अफ्रीकी देश टोगो की अगुवाई में और 55 देशों वाले अफ्रीकी संघ के समर्थन से यह प्रस्ताव लाया गया है। मांग यह है कि 1569 से चले आ रहे पारंपरिक मर्केटर मैप को हटाकर वास्तविक आकार दर्शाने वाले 'इक्वल अर्थ मैप' को वैश्विक रूप से अपनाया जाए।
आइए आसान भाषा में समझते हैं कि सदियों पुराना नक्शा गलत क्यों माना जा रहा है और इसको लेकर UN में इतना बड़ा विवाद क्यों खड़ा हुआ है।
क्या है 450 साल पुराना मर्केटर मैप और विवाद की असली वजह?
सन 1569 में फ्लेमिश मानचित्रकार गेरार्डस मर्केटर ने एक नक्शा तैयार किया था। उस समय इसका मुख्य मकसद समुद्री नाविकों को सीधी रेखा में दिशा दिखाना था। लेकिन इस गोल पृथ्वी को चपटे कागज पर ढालने के चक्कर में एक बड़ी गड़बड़ी हो गई।
भूमध्य रेखा के पास के देश छोटे दिखने लगे: अफ्रीका, भारत और दक्षिण अमेरिका जैसे भूमध्य रेखा के पास स्थित क्षेत्रों का आकार नक्शे में उनकी असली सीमा से काफी छोटा हो गया।
ध्रुवों के पास के देश बड़े दिखने लगे: यूरोप, उत्तरी अमेरिका और ग्रीनलैंड जैसे ध्रुवों के पास वाले देश अपनी असली सीमा से कई गुना ज्यादा विशाल दिखाई देने लगे।
ग्रीनलैंड बनाम अफ्रीका: असली सच चौंका देने वाला है
नक्शे की इस गड़बड़ी का सबसे हैरान करने वाला उदाहरण ग्रीनलैंड और अफ्रीका का मुकाबला है। मर्केटर मैप पर ग्रीनलैंड और पूरा अफ्रीका महाद्वीप लगभग एक ही साइज के दिखाई देते हैं। जबकि कड़वी सच्चाई ये है कि अफ्रीका महाद्वीप असल में ग्रीनलैंड से 14 गुना ज्यादा बड़ा है।
अफ्रीका का क्षेत्रफल (3.03 करोड़ वर्ग किमी) इतना बड़ा है कि इसके भीतर अमेरिका, चीन, भारत, जापान, मैक्सिको और लगभग पूरा यूरोप एक साथ समा सकते हैं। इसी गैर-बराबरी को लेकर अफ्रीकी संघ ने #CorrectTheMap अभियान शुरू किया है। टोगो के विदेश मंत्री रॉबर्ट डुसे ने कहा, 'अफ्रीका कोई विशेषाधिकार या दया की भीख नहीं मांग रहा। हम बस दुनिया के भूगोल में अपनी असली जगह और सही आकार मांग रहे हैं।'
'कार्टोग्राफिक उपनिवेशवाद' और 'इक्वल अर्थ मैप' का विकल्प
आलोचकों और भूगोलवेत्ताओं का कहना है कि मर्केटर मैप का यह गलत फैलाव पश्चिमी देशों को ज्यादा शक्तिशाली और समृद्ध दिखाने का एक जरिया बना, जिसे 'कार्टोग्राफिक कोलोनियलिज्म' कहा जाता है। इससे दुनिया की सोच में ग्लोबल साउथ का दबदबा कम आंका गया।
क्या है 'Equal Earth' मैप?
संयुक्त राष्ट्र में जिस नए नक्शे को अपनाने की बात हो रही है, उसे 2018 में कार्टोग्राफर्स की टीम ने विकसित किया था। इसे 'इक्वल अर्थ मैप' कहा जाता है। यह नक्शा बिना किसी देश की आकृति को ज्यादा बिगाड़े, हर महाद्वीप और देश को उसके वास्तविक अनुपातिक आकार में दिखाता है।
अगर UN में प्रस्ताव पास हो गया तो क्या-क्या बदलेगा?
संयुक्त राष्ट्र महासभा का यह प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्यकारी तो नहीं होगा, लेकिन यदि यह पास हो जाता है तो:
स्कूल और किताबें: दुनिया भर के स्कूलों, प्रकाशकों और शैक्षणिक संस्थानों में नए और सही आकार वाले नक्शे पढ़ाए जाने लगेंगे।
टेक कंपनियां: गूगल मैप्स और अन्य डिजिटल नेविगेशन कंपनियां अपनी वैश्विक मैपिंग में 'इक्वल अर्थ' प्रोजेक्शन को प्राथमिकता दे सकती हैं।
वैश्विक नजरिया: अफ्रीका और एशिया जैसे बड़े महाद्वीपों के असली आकार को देखकर दुनिया का उनके प्रति भौगोलिक और रणनीतिक दृष्टिकोण बदलेगा।