विक्रम साराभाई और कमला चौधरी का वो रिश्ता जो मुकम्मल न होकर भी इतिहास बदल गया, जानिए क्या है IIM Ahemdabad के बनने की कहानी

विक्रम साराभाई और कमला का रिश्ता समय के साथ गहरा होता गया। कमला जानती थीं कि उनका रिश्ता बहुत नाजुक है। इसी वजह से उन्होंने अहमदाबाद छोड़कर दिल्ली जाने का फैसला किया। लेकिन विक्रम साराभाई उन्हें जाने देना नहीं चाहते थे। उन्हें रोकने की कोशिश में आईआईएम अहमदाबाद की नींव पड़ी।

अपडेटेड Oct 25, 2025 पर 5:03 PM
साराभाई ने सरकार और फाउंडेशन को अहमदाबाद में आईआईएम खोलने के लिए राजी कर लिया।

IIM Ahemdabad देश का प्रीमियम मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट ही नहीं है, से अधूरे रिश्ते का गवाह भी है। एक ऐसा रिश्ता, जो दुनिया की नजर में होकर भी नहीं था और जिसका होना सही भी नहीं था। मगर, कुछ संबंध सोच और समझ से परे, भावनाओं के और बौद्धिक स्तर पर आधारित होते हैं। ऐसा ही था देश के महान वैज्ञानिकों में से एक विक्रम साराभाई और कमला चौधरी का रिश्ता है। कमला के भांजे और मनोविश्लेषक सुधीर काकर ने अपनी किताब 'A Book Of Memory: Confessions and Reflections' में दावा किया है कि देश का प्रमुख प्रबंधन संस्थान आईआईएम अहमदाबाद अपने समय की इन दो दिग्गज हस्तियों के संबंध की नींव था।

डॉ. विक्रम साराभाई का नाम भारत तो क्या दुनिया में भी पहचान का मोहताज नहीं है। यह नाम हम भारतीयों के लिए भारत के अंतरिक्ष मिशन की पहचान हैं। उन्होंने भारत को अंतरिक्ष तक पहुंचाया और वो मानते थे कि विज्ञान सिर्फ प्रयोगशालाओं के लिए नहीं बल्कि समाज के बदलाव के लिए भी होना चाहिए। अहमदाबाद के प्रसिद्ध औद्योगिक परिवार में 1919 में उनका जन्म हुआ। उनके पिता अंबालाल साराभाई उस दौर के बड़े वस्त्र उद्योगपति थे और उनका घर स्वतंत्रता सेनानियों व विचारकों का आना-जाना लगा रहता था। इस माहौल ने विक्रम में विज्ञान और समाज सुधार दोनों के प्रति गहरी रुची जगाई। लेकिन पढ़ाई के लिए वो लंदन चले गए और कैंब्रिज यूनिवर्सिटी (इंग्लैंड) से नेचुरल साइंस में पढ़ाई की। बाद में यहीं से कॉस्मिक रे रिसर्च में पीएचडी की। विक्रम द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भारत लौट आए। उन्होंने बेंगलुरु के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (IISc) में नोबेल विजेता सी.वी. रमन (CV Raman) के साथ काम किया। 1947 में उन्होंने 'फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी' (PRL) की स्थापना की, जो आगे चलकर भारत के अंतरिक्ष मिशन की नींव बनी।

अपने देश और समाज को लेकर विक्रम साराभाई का सपना बड़ा था। उन्होंने 1950 के दशक में अहमदाबाद टेक्सटाइल इंडस्ट्री रिसर्च एसोसिएशन (ATIRA) बनाई। इसी दौरान उनकी मुलाकात हुई कमला चौधरी से जो मनोविज्ञान में प्रशिक्षित, स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय और सामाजिक सुधारों में गहरी रुची रखने वाली महिला थीं। कमला अमेरिका की मिशिगन यूनिवर्सिटी से मनोविज्ञान में पढ़ाई कर चुकी थीं और भारत में समाज सुधार के कामों से जुड़ी थीं। इतना ही नहीं कमला विक्रम की पत्नी और मश्हूर नृत्यांगना मृणालिनी साराभाई की बहुत अच्छी दोस्त थीं।

विक्रम साराभाई और कमला का रिश्ता समय के साथ और भी गहरा होता गया। हालांकि कमला जानती थीं कि उनका रिश्ता बहुत नाजुक है और उनका जुड़ाव चाहे कितना ही सम्मानजनक और सच्चा क्यों न हो, लेकिन नैतिकता के पैमाने पर खरा नहीं उतरता है। इसी वजह से उन्होंने अहमदाबाद छोड़कर दिल्ली जाने का फैसला किया। लेकिन विक्रम साराभाई उन्हें जाने देना नहीं चाहते थे। इसी समय उन्हें भारत सरकार और फोर्ड फाउंडेशन देश में प्रबंधन शिक्षा को बढ़ावा देने की योजना पर काम करने के बारे में जानकारी मिली। साराभाई ने इस अवसर को भांपते हुए अहमदाबाद को केंद्र बनाने का सुझाव दिया। उन्होंने अपने प्रभाव से सरकार और फाउंडेशन को अहमदाबाद में आईआईएम खोलने के लिए राजी कर लिया। 1961 में आईआईएम अहमदाबाद की स्थापना हुई, और कमला चौधरी इस संस्थान की पहली फैकल्टी सदस्य बनीं। उन्होंने इसके बौद्धिक और सांस्कृतिक ढांचे को आकार दिया और संस्थान की आत्मा में “मानवता और सामाजिक जिम्मेदारी” का भाव भरा।

हालांकि, विक्रम साराभाई की बेटी मल्लिका साराभाई दोनों के रिश्ते के रोमांटिक पहलू से इनकार करती हैं। वो ये तो मानती हैं उनके बीच काफी गहरा रिश्ता था, लेकिन आईआईएम अहमदाबाद बनने की सिर्फ यही वजह थी, ऐसा वो मानने को तैयार नहीं हैं। उन्होंने कहा, ‘पापा और कमला के बीच गहरा रिश्ता था लेकिन यह कहना कि IIM सिर्फ उन्हें यहां रखने के लिए बनाया गया उनके विजन के साथ अन्याय होगा। मनोविश्लेषक हर चीज में निजी मकसद ढूंढ लेते हैं।’

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