भारत में डाक सेवा केवल एक सरकारी व्यवस्था नहीं, बल्कि भावनाओं को जोड़ने वाली एक मजबूत कड़ी रही है। पुराने जमाने में जब न तो मोबाइल था, न इंटरनेट, तब चिट्ठियां ही अपनों से जुड़े रहने का सबसे विश्वसनीय माध्यम हुआ करती थीं। और इन चिट्ठियों का सबसे अहम साथी होता था लेटर बॉक्स। आज भी भारत के कई कोनों में आपको सड़क किनारे खड़ा, एक शांत और स्थिर लाल रंग का लेटर बॉक्स नजर आ जाएगा। लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि इन लेटर बॉक्स का रंग हमेशा लाल ही क्यों होता है? क्या ये बस परंपरा है या इसके पीछे कोई खास वजह छिपी है?
असल में इस रंग के चुनाव के पीछे विज्ञान, व्यवहारिकता और इतिहास—तीनों की दिलचस्प कहानी है। आइए, जानते हैं कि आखिर क्यों डाक विभाग ने इस खास रंग को ही अपनाया और कैसे ये लाल डिब्बा भारतीय समाज में एक खास पहचान बन गया।
पहले हरे थे, लेकिन लोग ढूंढ़ नहीं पाते थे
ब्रिटिश राज के शुरुआती दिनों में जब इंडिया में पोस्टल सर्विस की नींव रखी गई, तब लेटर बॉक्स का रंग हरा हुआ करता था। लेकिन हरे रंग की एक दिक्कत थी—वो प्रकृति में बहुत घुल-मिल जाता था। यानी लोग इन बॉक्स को ढूंढ़ ही नहीं पाते थे। तब भारी मात्रा में शिकायतें आने लगीं।
साल 1874 में पोस्टल विभाग ने बड़ा फैसला लिया और सभी लेटर बॉक्स को लाल रंग में रंगने की योजना बनाई। इसका कारण था—लाल रंग दूर से सबसे पहले नजर आता है। विज्ञान के अनुसार, लाल रंग की वेवलेंथ सबसे लंबी होती है, इसलिए ये कम रोशनी में भी साफ दिखता है। इसके अलावा:
लाल रंग सावधानी और तात्कालिकता का प्रतीक है
ये रंग लोगों का ध्यान सबसे तेजी से खींचता है
इमरजेंसी संकेतों और चेतावनियों में भी लाल रंग ही प्रमुखता से दिखता है
दुनिया भर में फैली यह परंपर
भारत ही नहीं, जहां-जहां ब्रिटिश साम्राज्य फैला, वहां-वहां लाल रंग के लेटर बॉक्स लगाए गए। आज भी इंग्लैंड, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में ये आम बात है। हालांकि कुछ देशों ने अपनी सुविधा के अनुसार अलग रंगों को भी अपनाया।
क्या आज भी सभी लेटर बॉक्स लाल होते हैं?
नहीं। अब डाक सेवाओं की कैटेगरी के हिसाब से लेटर बॉक्स के रंग भी बदल गए हैं:
हरा बॉक्स: लोकल यानी उसी शहर की चिट्ठियों के लिए
नीला बॉक्स: मेट्रो शहरों में भेजी जाने वाली डाक के लिए
पीला बॉक्स: विभिन्न राज्यों की राजधानियों के लिए चुनी गई चिट्ठियां