तारीख 27 दिसंबर, 2007... जब 15 साल के हमलावर बिलाल ने एक धमाका किया और किसी भी मुस्लिम देश की कमान संभालने वाली पहली महिला बेनजीर भुट्टो की मौत हो गई। उस दौरान बेनजीर, रावलपिंडी में एक चुनावी रैली में अपना भाषण खत्म कर लौट रही थीं। हमलावार ने पहले उन्हें गोली मारी और फिर खुद को उड़ा दिया। बेनजीर की हत्या के 18 साल बीत चुके हैं। बेनजीर भुट्टो की हत्या ने पाकिस्तान को हिला कर रख दिया था। वहीं इस हत्याकांड के करीब 20 साल पहले बेनजीर भुट्टो की शादी ने भी पूरे पाकिस्तान को हैरान कर दिया था।
18 दिसंबर 1987 को पाकिस्तान में बेनजीर भुट्टो और आसिफ अली जरदारी का निकाह हुआ। इस रिश्ते को बहुत ही असमान्य माना गया था। 29 जुलाई 1987 को भुट्टो परिवार के कुछ सदस्य और करीबी दोस्त लंदन में बेनज़ीर भुट्टो की बहन सनम भुट्टो के अपार्टमेंट में इकट्ठा हुए थे। उस समय परिवार पहले से ही कई मुश्किलों का सामना कर रहा था, लेकिन इसके बावजूद बेगम नुसरत भुट्टो काफी शांत और संयमित नजर आ रही थीं। इस मौके पर आसिफ जरदारी के पिता हाकिम अली जरदारी और उनकी पत्नी भी मौजूद थे। वहां एक फोटोग्राफर भी बुलाया गया था।
बेनजीर के इस ऐलान से हैरान थे लोग
कुछ देर की खामोशी के बाद बेनज़ीर भुट्टो ने सबको संबोधित करते हुए कहा, “ये आसिफ जरदारी हैं, मेरे मंगेतर।” यह बात सुनकर वहां मौजूद लोग चौंक गए। अगले ही दिन इस समारोह की एक तस्वीर और उससे जुड़ी खबर मीडिया में छप गई। बेनज़ीर एक खुले और आधुनिक माहौल में पली-बढ़ी थीं, इसलिए उनके कई दोस्त यह जानकर हैरान थे कि उन्होंने अरेंज मैरिज क्यों चुनी। कुछ अखबारों और कॉलम लिखने वालों ने तो यह भी अंदाजा लगाया कि शायद शादी के बाद बेनजीर राजनीति से दूर हो जाएंगी। हालांकि, बहुत से लोगों को तब और ज्यादा हैरानी हुई जब बेनज़ीर ने इस अरेंज मैरिज के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। कुछ लोगों को लगा कि शादी के बाद उन्हें राजनीति में पीछे कर दिया जाएगा, लेकिन इसके उलट इस शादी ने उनकी राजनीतिक स्थिति को और मजबूत कर दिया।
शादी के बाद कराची में एक भव्य शादी समारोह हुआ। इस शादी ने देश के दो प्रभावशाली परिवारों को आपस में जोड़ दिया। बेनज़ीर भुट्टो ने बिजनेसमैन और ज़मींदार हाकिम अली ज़रदारी के बेटे आसिफ अली जरदारी से शादी की। यह शादी अरेंज्ड मैरिज थी, जो बेनज़ीर के लिए लोगों को थोड़ी हैरान करने वाली लगी। बेनज़ीर पढ़ी-लिखी और आधुनिक सोच वाली थीं, इसलिए अरेंज मैरिज का फैसला सबको चौंकाता था। उन्होंने खुद बताया था कि उन्हें आसिफ अली ज़रदारी से शादी का प्रस्ताव स्वीकार करने से सिर्फ पांच दिन पहले ही मिलवाया गया था। यह फैसला उन्होंने सोच-समझकर अपने निजी कारणों से लिया था।
इससे पहले भी, साल 1986 में जब बेनज़ीर पढ़ाई के सिलसिले में विदेश में थीं, तब उनके लिए कई शादी के प्रस्ताव आए थे। इसके बावजूद यह रिश्ता आगे बढ़ा। ज़ुल्फिकार अली भुट्टो के पुराने साथी और कराची में सिनेमा व्यवसाय से जुड़े हाकिम अली ज़रदारी ने यह प्रस्ताव रखा, जो आखिरकार शादी में बदल गया।
बेनज़ीर भुट्टो ने भारतीय पत्रकार और अपने पुराने दोस्त श्याम भाटिया को अपनी आत्मकथा गुडबाय शहजीदी में बताया था कि आसिफ अली ज़रदारी की अगर कोई साफ तौर पर दिखने वाली कमी थी, तो वह उनका पोलो खेलने का शौक था।
लंदन में शुरू हुई थी कहानी
यह पूरी कहानी शादी से करीब एक साल पहले लंदन में शुरू हुई। 29 जुलाई 1987 को ज़रदारी की सौतेली मां बेगम ज़रीन के जरिए बेगम नुसरत भुट्टो को बेनज़ीर के लिए शादी का औपचारिक प्रस्ताव मिला। उस समय आसिफ अली ज़रदारी लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में पढ़ाई कर रहे थे और पढ़ाई पूरी होने के बाद हाउसिंग बिज़नेस शुरू करने की योजना बना रहे थे। लंदन में रहने के दौरान आसिफ, बेनज़ीर के निर्वासन के समय कभी-कभी उनकी मां नुसरत भुट्टो से मिलने जाते थे। इन मुलाकातों के दौरान उन्होंने बेगम नुसरत भुट्टो का भरोसा जीत लिया, जिसके बाद यह रिश्ता आगे बढ़ा।
पाकिस्तान का ऐतिहासिक मौका
बेनजीर भुट्टो इस शादी को सिर्फ एक निजी कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक मौका बनाना चाहती थीं। इसी वजह से उन्होंने फाइव-स्टार होटल में सीमित लोगों के बीच समारोह करने से इनकार कर दिया। इसके बजाय कराची में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के मजबूत इलाके लियारी के किकरी ग्राउंड को चुना गया। किसी को औपचारिक निमंत्रण नहीं भेजा गया था, लेकिन फिर भी बड़ी संख्या में लोग वहां पहुंच गए। इसमें दोनों परिवारों के सदस्य और पार्टी के समर्थक शामिल थे। शादी के दिन बेनज़ीर ने सोने की कढ़ाई वाली सफेद सिल्क की पोशाक पहनी थी, जबकि आसिफ अली ज़रदारी ने पारंपरिक बलूची पगड़ी और क्रीम रंग की पारंपरिक पैंट पहनी थी। निकाह की रस्म भारी भीड़ के बीच हुई और माहौल किसी बड़ी जनसभा जैसा लग रहा था। इस मौके पर आसिफ ने बेनज़ीर को हीरे और नीलम जड़ी दिल के आकार की एक अंगूठी तोहफे में दी।
शादी के बाद इस जोड़े की राजनीतिक ज़िंदगी में बड़ा बदलाव आया। आसिफ अली ज़रदारी की राजनीति में दिलचस्पी तेजी से बढ़ने लगी। 1988 के चुनावों के बाद उन्होंने नवाज शरीफ को राजनीतिक रूप से चुनौती देने में अहम भूमिका निभाई। उस समय नवाज शरीफ, बेनज़ीर भुट्टो के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की कोशिश कर रहे थे।