Hormuz Crisis: ईरान-इजरायल युद्ध के कारण 'होर्मुज जलडमरूमध्य' से तेल की सप्लाई ठप हो गई है और वैश्विक तेल बाजार में $100 प्रति बैरल से ऊपर की अस्थिरता है। जहां दुनिया के कई देश सप्लाई चेन टूटने से सहमे हुए हैं, वहीं चीन इस संकट में काफी हद तक शांत नजर आ रहा है। इसका कारण कोई चमत्कार नहीं, बल्कि पिछले 20 सालों से बीजिंग द्वारा की गई एक सोची-समझी और बहुस्तरीय तैयारी है।
होर्मुज पर कितनी है चीन की निर्भरता?
दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। चीन अपनी समुद्री तेल आयात का बड़ा हिस्सा ईरान से खरीदता है। चीन ईरान से आने वाले समुद्री तेल का 80% से ज्यादा हिस्सा खरीदता है। 2025 के आंकड़ों के अनुसार, चीन ने रोजाना औसतन 13.8 लाख बैरल ईरानी तेल का आयात किया। चीन बखूबी जानता था कि होर्मुज एक 'चोक पॉइंट' है। अगर यह रास्ता बंद हुआ, तो उसकी अर्थव्यवस्था का पहिया थम सकता है। इसी डर से उसने दो दशक पहले एक 'बैकअप प्लान' पर काम शुरू कर दिया था।
चीन की 'मल्टी-लेयर्ड' रणनीति के 4 स्तंभ
बीजिंग ने केवल एक भरोसे पर रहने के बजाय अपनी ऊर्जा सुरक्षा को चार हिस्सों में बांटा है:
1. विशाल रणनीतिक तेल भंडार: चीन ने पिछले दो दशकों में ऐसे बड़े स्टोरेज बनाए हैं जहां करोड़ों बैरल कच्चा तेल जमा रहता है। रिपोर्टों के अनुसार, ये भंडार चीन की 100 दिनों से अधिक की तेल जरूरतों को पूरा करने में सक्षम हैं, जिससे वह वैश्विक झटकों को आसानी से झेल सकता है।
2. ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण: चीन अब केवल मिडिल ईस्ट पर निर्भर नहीं है। उसने रूस के साथ बड़ी पाइपलाइनें बिछाई हैं और लंबे समय के कॉन्ट्रैक्ट्स किए हैं। इसके अलावा, अफ्रीका, मध्य एशिया और लैटिन अमेरिका से भी तेल आयात बढ़ाकर उसने अपना जोखिम कम कर लिया है।
3. 'बेल्ट एंड रोड' और बुनियादी ढांचा: 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' (BRI) के तहत चीन ने एशिया, अफ्रीका और मध्य पूर्व में ऐसे बंदरगाहों और पाइपलाइनों में निवेश किया है, जो समुद्र के रास्तों के बंद होने पर 'वैकल्पिक मार्ग' प्रदान करते हैं। रूस और मध्य एशिया से आने वाली पाइपलाइनें उसे समुद्री मार्ग की अनिश्चितता से बचाती हैं।
4. ईरान के साथ 25 साल का समझौता: ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद, चीन ने उनके साथ 25 साल का रणनीतिक सहयोग समझौता किया है। इसमें चीनी निवेश के बदले ईरान उसे रियायती दरों पर तेल सप्लाई करता रहता है, चाहे भू-राजनीतिक हालात कुछ भी हों।
सैन्य टकराव से दूरी, कूटनीति पर जोर
चीन की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वह मिडिल ईस्ट के संघर्षों में कभी भी 'सैन्य रूप से' शामिल नहीं होता। बीजिंग का ध्यान हमेशा युद्ध के बजाय बातचीत और डी-एस्केलेशन पर होता है है। अपनी कूटनीति को वह हमेशा अपने आर्थिक हितों (तेल और इंफ्रास्ट्रक्चर) को बचाने के लिए उपयोग करता है, जिससे वह विवादों के बीच भी व्यापार करने में सफल रहता है।
विश्लेषकों का मानना है कि जो संकट आज दुनिया के लिए 'अचानक' आया है, चीन के लिए वह एक ऐसी स्थिति है जिसके लिए वह पिछले 20 सालों से तैयारी कर रहा था। भंडार, पाइपलाइनें और विविधीकरण ने चीन को इस वैश्विक ऊर्जा संकट में एक 'सुरक्षित कवच' प्रदान किया है।