US Russia Sanctions Bill: अमेरिका के हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने 'लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026' को 262-159 के भारी बहुमत से पारित कर दिया है। यह बिल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस से कच्चा तेल और गैस खरीदने वाले शीर्ष देशों जिसमें भारत और चीन शामिल हैं उन पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार देता है।
सीनेट से पहले ही पास हो चुका यह बिल अब राष्ट्रपति ट्रंप के हस्ताक्षर के लिए भेजा गया है। भारत अपनी जरूरत का 88% से अधिक कच्चा तेल इंपोर्ट करता है और कुल जरूरत का करीब एक-तिहाई से आधा हिस्सा रियायती रूसी कच्चे तेल से पूरा करता है।
इस घटनाक्रम के बीच सवाल उठ रहा है कि क्या भारत पर 100% टैरिफ लगने जा रहा है? और अगर ऐसा होता है तो भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसका क्या असर पड़ेगा?
क्या भारत पर तुरंत 100% टैरिफ लग जाएगा?
इसका जवाब हैं नहीं, यह कोई ऑटोमैटिक या तुरंत लागू होने वाला शुल्क नहीं है। यह कानून राष्ट्रपति ट्रंप को रूस से तेल/गैस खरीदने वाले दुनिया के 5 सबसे बड़े खरीदारों पर टैरिफ लगाने का अधिकार देता है। यह फैसला ट्रंप को करना है कि वह टैरिफ लगाते हैं या नहीं, और अगर लगाते हैं तो उसकी दर (0% से 100% के बीच) क्या होगी।
बिल में अमेरिकी प्रशासन को छूट देने का भी अधिकार दिया गया है। यानी यह कानून भारत पर एक 'संभावित खतरे' का दबाव बनाता है, न कि कोई सीधी पेनल्टी लागू करता है।
भारत पर क्या हो सकता है इसका असर?
अगर राष्ट्रपति ट्रंप इस कानून के तहत भारत पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने का फैसला करते हैं, तो इसका असर सीधे रूसी तेल की कीमत पर नहीं, बल्कि अमेरिकी बाजार में बिकने वाले भारतीय सामानों पर पड़ेगा:
भारतीय निर्यात होंगे महंगे: अमेरिकी बाजार में भारत के कपड़े, जेम्स एंड ज्वेलरी, फार्मास्यूटिकल्स और इंजीनियरिंग गुड्स पर अगर अतिरिक्त ड्यूटी लगती है, तो वे अमेरिका में महंगे हो जाएंगे। इससे भारतीय निर्यातकों को भारी नुकसान हो सकता है।
फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) पर साया: भारत और अमेरिका के बीच एक द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर बातचीत अंतिम चरण में है। केंद्रीय वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल के मुताबिक समझौता लगभग फाइनल है। लेकिन इस नए अमेरिकी कानून से ट्रेड डील की शर्तों पर अनिश्चितता के बादल मंडरा सकते हैं।
भारत रूस से तेल खरीदना बंद क्यों नहीं कर सकता?
फरवरी 2022 में यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से पश्चिमी देशों के बैन के बीच भारत की सरकारी और निजी रिफाइनरियों ने सस्ता रूसी क्रूड आयात बढ़ाया। वित्तीय वर्ष 2026 में भारत ने $40.8 अरब डॉलर का रूसी कच्चा तेल खरीदा (कुल आयात का एक-तिहाई)। जुलाई 2026 में भारत के कुल आयातित तेल में रूस की हिस्सेदारी 51% और अगस्त में 45% (2.08 मिलियन बैरल प्रतिदिन) रही।
अब पूरी गेंद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पाले में है। ट्रंप इस बिल पर हस्ताक्षर कर इसे कानून बनाएंगे। इसके बाद वाशिंगटन यह तय करेगा कि भारत के साथ कूटनीतिक और आर्थिक रिश्तों को देखते हुए क्या इस अधिकार का इस्तेमाल करना है या बातचीत के जरिए कोई बीच का रास्ता निकालना है।
फिलहाल भारत के लिए यह स्थिति काफी संवेदनशील है। एक तरफ भारत अमेरिका के साथ अपने व्यापारिक संबंध मजबूत कर रहा है, तो दूसरी तरफ देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतें काबू में रखने के लिए सस्ता रूसी तेल आयात करना भारत की मजबूरी और जरूरत दोनों है। अब कुल मिलाकर भारत का कूटनीतिक रुख यही रहेगा कि वह अमेरिका को साधते हुए अपनी ऊर्जा सुरक्षा से कोई समझौता न करे।