Bagram Air Base : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अफगानिस्तान के बगराम एयरबेस को पाने के लिए बड़ा दांव खेलने को तैयार नजर आ रहे हैं। उन्होंने हाल ही में इस बारे में बताया था कि अमेरिका बगराम एयरबेस पर नियंत्रण के लिए बातचीत कर रहा है। हालांकि, तालिबान ने साफ कर दिया है कि विदेशी सैनिक को उसकी जमीन पर तैनाती की अनुमति नहीं होगी। तालिबान के इस कदम ने ट्रंप को नाराज कर दिया है। बगराम एयरबेस पहले अमेरिका के नियंत्रण में था लेकिन 2021 में अमेरिकी सेना की वापसी के बाद तालिबान के हाथों में चला गया था।
ट्रंप ने साफ कहा कि अगर बगराम एयरबेस अमेरिका को वापस नहीं सौंपा गया, तो इसके गंभीर नतीजे होंगे। उन्होंने ट्रुथ सोशल पर लिखा – “अगर अफ़ग़ानिस्तान बगराम एयरबेस को उसके असली निर्माता, यानी अमेरिका को वापस नहीं करता, तो बुरी चीज़ें जरूर होंगी।” डोनाल्ड ट्रंप ने बगराम एयरबेस को अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बेहद अहम बताया। उन्होंने कहा कि यह बेस पश्चिमी चीन के करीब है, जहां बीजिंग का परमाणु हथियार कार्यक्रम चल रहा है। ट्रंप ने पहले भी अफगानिस्तान से बाइडेन सरकार की वापसी को बड़ी गलती करार दिया था। उनका आरोप है कि बगराम में अरबों डॉलर का सैन्य सामान छोड़ दिया गया। इस साल फरवरी में भी उन्होंने कहा था कि बाइडेन ने इस बेस को बिना वजह खाली कर दिया, जबकि वहां सीमित संख्या में अमेरिकी सैनिकों को रखना संभव था। ट्रंप के अनुसार, “बगराम एक बहुत ही महत्वपूर्ण रणनीतिक ठिकाना था। इसे हमें कभी नहीं छोड़ना चाहिए था।”
पाकिस्तान के लिए होगा फायदा!
सूत्रों के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन का पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर से सीधे संपर्क करना इस बात की ओर इशारा करता है कि वाशिंगटन काबुल के बजाय रावलपिंडी को अहम मान रहा है। ट्रंप का यह कदम इस बात का संकेत है कि अमेरिका मानता है कि अफग़ानिस्तान के मामलों में पाकिस्तान अभी भी मुख्य भूमिका निभा रहा है और वहां का दरवाजा उसके ही हाथों में है।
एक्सपर्ट का मानना है कि अगर अमेरिका पाकिस्तान के सहयोग से दोबारा बगराम एयरबेस में अपनी मौजूदगी दर्ज करता है, तो इस्लामाबाद को बड़ा फायदा होगा। उसे न केवल सैन्य मदद और उपकरण मिलेंगे, बल्कि राजनीतिक स्तर पर भी उसका महत्व बढ़ जाएगा। इससे पाकिस्तान 2021 के बाद खोई हुई अपनी प्रासंगिकता दोबारा हासिल कर सकता है। उन्होंने कहा कि तालिबान के विरोध की स्थिति में अमेरिका अकेले यह लक्ष्य हासिल नहीं कर सकता। इसके लिए या तो पाकिस्तान की मदद लेनी होगी या तालिबान को भीतर से कमजोर करना होगा। बगराम में अमेरिकी सेना की वापसी एक बार फिर बाहरी ताकत की मौजूदगी को स्थापित करेगी, लेकिन इससे काफी कुछ अमेरिका और पाकिस्तान के पक्ष में झुक सकता है। साथ ही, उन्होंने यह भी जोड़ा कि अमेरिकी समर्थन पर पाकिस्तान की यह नई भूमिका उसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर अहम भुमिका दिला सकती है।
बगराम की अहमियत
काबुल से करीब 40 किलोमीटर उत्तर में परवान प्रांत की 1,492 मीटर ऊंचाई पर स्थित बगराम एयरबेस रणनीतिक दृष्टि से बेहद खास माना जाता है। इसे 1950 के दशक में सोवियत संघ ने बनाया था और बाद में यह मध्य और दक्षिण एशिया में अमेरिका का सबसे महत्वपूर्ण ठिकाना बन गया। यहां दो बड़े रनवे हैं—एक लगभग 11,800 फीट लंबा और दूसरा करीब 9,700 फीट लंबा। इन पर दुनिया के सबसे बड़े ट्रांसपोर्ट और फाइटर प्लेन आसानी से उतर सकते हैं।अमेरिका के नियंत्रण के दौरान बगराम एक छोटे शहर जैसा था। यहां हजारों सैनिक रहते थे, 50 बेड वाला अस्पताल था, पश्चिमी देशों जैसी दुकानें मौजूद थीं और एक बड़ा हिरासत केंद्र भी था, जहां तालिबान और अल-कायदा के बड़े कैदियों को रखा जाता था।
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