China Green Energy Global Expansion: कैरेबियाई देश क्यूबा इन दिनों गंभीर बिजली संकट और ब्लैकआउट से जूझ रहा है। इस बीच चीन ने क्यूबा को 5,000 सोलर फोटोवोल्टिक (PV) सिस्टम भेजे हैं, जिन्हें अस्पतालों, प्रमुख संस्थानों और ऑफ-ग्रिड इलाकों में लगाया जा रहा है। सतह पर यह एक मानवीय मदद दिखती है, लेकिन इसके पीछे चीन का एक बहुत बड़ा जियोपॉलिटिकल और इकोनॉमिक मास्टरप्लांन छिपा हुआ है।
चीन सिर्फ दुनिया का सबसे बड़ा सोलर और विंड इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर ही नहीं रहा, बल्कि अब वह अपनी 'क्लीन एनर्जी टेक्नोलॉजी' का इस्तेमाल ग्लोबल साउथ के देशों में अपना राजनीतिक और तकनीकी दबदबा बढ़ाने के लिए कर रहा है।
क्यूबा का उदाहरण क्यों है सबसे खास?
अमेरिकी प्रतिबंधों और ईंधन संकट के बीच पिस रहे क्यूबा के लिए चीनी सोलर पैनल किसी जीवनदान से कम नहीं हैं। पिछले 5 वर्षों में क्यूबा द्वारा चीनी सोलर पैनलों के आयात में 1,800% से अधिक की भारी वृद्धि हुई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि तेल के लिए अन्य देशों पर निर्भर रहने वाला क्यूबा अब धीरे-धीरे इनवर्टर, पैनल, स्पेयर पार्ट्स और बैटरी के लिए चीन पर वित्तीय व तकनीकी रूप से निर्भर होता जा रहा है।
अमेरिका और यूरोपीय संघ (EU) के टैरिफ से परेशान चीन के पास विशाल ओवरकैपेसिटी है। अमेरिका के ठीक पड़ोस (कैरेबियाई क्षेत्र) में क्यूबा की मदद करके चीन अपने पुराने राजनीतिक साझेदार को टूटने से बचा रहा है और अमेरिका को कड़ा संदेश दे रहा है।
चीन ने कैसे बनाई 'रिन्यूएबल एनर्जी' में अपनी बादशाहत?
चीन की क्लीन एनर्जी इंडस्ट्री का आकार भारत, ब्राजील या कनाडा जैसे देशों की कुल जीडीपी के बराबर पहुंच चुका है। दुनिया भर के सोलर मैन्युफैक्चरिंग सप्लाई चेन के 80% से अधिक हिस्से पर अकेला चीन का कब्जा है। चीन के क्लीन एनर्जी सेक्टर ने वर्ष 2025 में रिकॉर्ड 15.4 ट्रिलियन युआन ($2.2 ट्रिलियन) का बिजनेस जनरेट किया, जो उसकी कुल GDP का 11.4% हिस्सा है।
2026 की पहली छमाही में चीन के 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' (BRI) के तहत 56% निवेश अकेले सोलर, विंड और हाइड्रो जैसे ग्रीन एनर्जी प्रोजेक्ट्स में हुआ है।
विकासशील देश क्यों खरीद रहे हैं चीनी तकनीक?
अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के विकासशील देशों के लिए चीनी सोलर उपकरण बेहद सस्ते, टिकाऊ और तेजी से लगने वाले हैं। सोलर और विंड पावर अब दुनिया के 91% नए प्रोजेक्ट्स में पारंपरिक कोयले या डीजल से सस्ते पड़ रहे हैं। केन्या, नामीबिया, पाकिस्तान, श्रीलंका और कंबोडिया जैसे देशों ने अपनी राष्ट्रीय ग्रिड क्षमता से अधिक चीनी सोलर उपकरण आयात कर लिए हैं।
क्या भारत बन सकता है चीन का विकल्प?
चीन के इस बढ़ते वर्चस्व को टक्कर देने के लिए भारत भी अपने सोलर मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम को तेजी से बढ़ा रहा है। भारत की PV मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी 2018 के 10 GW से बढ़कर 2026 में 172 GW तक पहुंच गई है। भारत की घरेलू मैन्युफैक्चरिंग बढ़ने से चीनी सोलर पैनलों का भारत में आयात 2020 के 8.2 GW से घटकर 2025 में सिर्फ 2.1 GW रह गया है।
हालांकि, भारत मॉड्यूल असेंबल तो कर रहा है, लेकिन अपस्ट्रीम मैन्युफैक्चरिंग (कच्चे माल और सिलिकॉन वेफर) के लिए अभी भी चीन पर निर्भर है। ग्लोबल साउथ को तकनीक निर्यात करने के लिए भारत को इस सप्लाई चेन गैप को भरना होगा।
कुल मिलाकर सच्चाई ये है कि चीन अपनी घरेलू 'ओवरकैपेसिटी' और पश्चिमी देशों के टैरिफ का मुकाबला करने के लिए क्लीन एनर्जी को एक शक्तिशाली 'जियोपॉलिटिकल टूल' बना चुका है। क्यूबा से लेकर अफ्रीका तक, चीन केवल सोलर पैनल नहीं बेच रहा, बल्कि आने वाले दशकों के लिए रणनीतिक और तकनीकी रिश्ते मजबूत कर रहा है।