नेपाल संग ये रिश्ता 200 साल पुराना पर अग्निपथ के बाद लगा ब्रेक! अब गोरखाओं की भर्ती पर क्या करने वाले हैं बालेन शाह
India-Nepal Relations: भारतीय सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ की नेपाल यात्रा के बीच नेपाल के पूर्व गोरखा सैनिकों ने प्रधानमंत्री बालेंद्र बालेन शाह की सरकार पर दबाव बढ़ा दिया है। इनकी मांग है कि भारत सरकार की अग्निपथ योजना के तहत नेपाली युवाओं की भारतीय सेना में भर्ती को लेकर बने गतिरोध को खत्म किया जाए
India-Nepal Relations: भारत और नेपाल के बीच का ऐतिहासिक रिश्ता एक बार फिर चर्चा में है
भारतीय सेना और नेपाल के गोरखा सैनिकों के बीच का ऐतिहासिक रिश्ता एक बार फिर चर्चा में है। भारतीय सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ की नेपाल यात्रा के बीच नेपाल के पूर्व गोरखा सैनिकों ने प्रधानमंत्री बालेंद्र बालेन शाह की सरकार पर दबाव बढ़ा दिया है। इनकी मांग है कि भारत सरकार की अग्निपथ योजना के तहत नेपाली युवाओं की भारतीय सेना में भर्ती को लेकर बने गतिरोध को खत्म किया जाए। हमारी सहयोगी वेबसाइट News18 की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस भर्ती विवाद ने भारत-नेपाल के सैन्य और राजनयिक संबंधों के बीच एक ऐसा सवाल खड़ा कर दिया है जिसपर रस्साकस्सी जारी है।
आपको बता दें कि जनरल धीरज सेठ ने अपनी तीन दिवसीय नेपाल यात्रा के दौरान पोखरा में आयोजित गोरखा भूतपूर्व सैनिक रैली में भी शामिल हो रहे हैं। पोखरा में हाल ही में हुए प्रदर्शनों के दौरान गोरखा दिग्गजों ने सीधे तौर पर कहा था कि खाड़ी देशों में जाकर काम करने से भारतीय सेना में अग्निवीर बनना कहीं बेहतर है। अपने नागरिकों और पूर्व सैनिकों का यह तर्क और दबाव नेपाल सरकार के सामने एक बड़ी दुविधा खड़ा करता नजर आ रहा है।
200 साल पुराना है गोरखाओं और भारतीय सेना का रिश्ता
इस विवाद को समझने से पहले हमें इतिसाह में भी झांकने की आवश्यकता है। आपको बता दें कि भारतीय सेना में गोरखा सैनिकों की भर्ती का इतिहास 200 साल से भी अधिक पुराना है। ब्रिटिश काल में 1814-16 के एंग्लो-नेपाली युद्ध के बाद गोरखाओं की बहादुरी से प्रभावित होकर उनकी भर्ती शुरू की गई थी। साल 1947 में भारत की आजादी के समय भारत, नेपाल और ब्रिटेन के बीच एक त्रिपक्षीय समझौता हुआ था।
इसके तहत 6 गोरखा रेजीमेंट आजाद भारत की सेना में शामिल हुईं और बाद में एक और रेजीमेंट बनाई गई। इस समझौते में भर्ती के साथ-साथ वेतन, पेंशन, छुट्टी और सेवा की शर्तें तय की गई थीं। यही वजह है कि नेपाल सरकार भारत के अग्निपथ सुधार को सिर्फ भारतीय सेना का आंतरिक मामला नहीं मानती।
क्या है अग्निपथ योजना और नेपाल को क्या है ऐतराज?
भारत सरकार ने जून 2022 में अग्निपथ योजना लागू की थी। इसके तहत थलसेना, नौसेना और वायुसेना में अग्निवीरों की 4 साल के लिए भर्ती की जाती है। 4 साल की सेवा के बाद 25% अग्निवीरों को नियमित सेवा में रखा जाता है, जबकि बाकी को सेवा निधि पैकेज देकर कार्यमुक्त कर दिया जाता है। नेपाल सरकार की मुख्य चिंता यह है कि अग्निपथ योजना गोरखा भर्ती के पारंपरिक मॉडल से बिल्कुल अलग है।
पहले की व्यवस्था में सैनिक लंबे समय तक सेवा करते थे और पेंशन के हकदार होते थे जबकि अग्निपथ में 4 साल बाद ज्यादातर युवाओं को सेवा से बाहर होना पड़ेगा। नेपाल का मानना है कि इस तरह का बड़ा बदलाव 1947 के त्रिपक्षीय समझौते के ऐतिहासिक ढांचे के खिलाफ है, इसलिए वह नई व्यवस्था के तहत भर्ती को हरी झंडी देने में संकोच कर रहा है।
पूर्व सैनिक और युवा क्यों कर रहे हैं भर्ती शुरू करने की मांग?
भर्ती प्रक्रिया को फिर से शुरू करने का दबाव सिर्फ नई दिल्ली की ओर से नहीं बल्कि नेपाल के भीतर से भी आ रहा है। नेपाल के कई परिवारों के लिए भारतीय सेना में शामिल होना सिर्फ सैन्य सेवा नहीं बल्कि सम्मानजनक रोजगार, बेहतर आय और सामाजिक सुरक्षा का जरिया रहा है।
पोखरा में प्रदर्शन कर रहे पूर्व सैनिकों ने नेपाल सरकार को दो सूत्री ज्ञापन सौंपा है। ये भी जानना अहम है कि इस भर्ती पर रोक से पहले हर साल करीब 1400 नेपाली युवा भारतीय सेना में शामिल होते थे। भर्ती बंद होने से नेपाली अर्थव्यवस्था और स्थानीय समुदायों पर असर पड़ रहा है।
क्या भर्ती रुकने से भारतीय सेना पर असर पड़ा है?
पूर्व सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने जनवरी 2025 में कहा था कि नए नेपाली गोरखा रंगरूटों की अनुपस्थिति से गोरखा बटालियनों की ऑपरेशनल तैयारी पर कोई असर नहीं पड़ा है। भारतीय सेना अपनी मौजूदा गोरखा यूनिट्स को वर्तमान में तैनात कर्मियों के साथ चलाना जारी रख सकती है। हालांकि लंबे समय तक भर्ती पर रोक रहने से इन विशेष रेजीमेंटों की पारंपरिक पहचान और निरंतरता पर भविष्य में सवाल खड़े हो सकते हैं।
प्रधानमंत्री बालेन शाह के सामने मुश्किल विकल्प
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह की सरकार के लिए यह मुद्दा एक कूटनीतिक और घरेलू संतुलन बनाने की चुनौती बन गया है। भारत का कहना है कि अग्निपथ अब उसकी मानक भर्ती प्रणाली है और नेपाली नागरिकों को भी इसमें भाग लेने का अवसर मिलना चाहिए। नेपाल अपनी संप्रभुता और पारंपरिक सेवा शर्तों के बदलाव को लेकर आशंकित है। इस बीच नेपाल के युवा और गोरखा पूर्व सैनिक रोजगार के इस बड़े अवसर को दोबारा शुरू करने की मांग कर रहे हैं।