ईरान की राजनीति का DNA है इंडियन? अयातुल्ला रूहोल्लाह खुमैनी का UP से है बहुत गहरा रिश्ता!
ग्लोबल अफेयर में रुचि रखने वाले लोग सोच रहे हैं कि अगर कुछ अनहोनी होती है, तो खामेनेई का उत्तराधिकारी कौन होगा? भले ही ईरान की राजनीति को समझने के लिए गहरे अध्ययन की जरूरत हो सकती है, लेकिन एक बात पर विशेषज्ञ आश्वस्त हैं कि उनका बेटा तो देश की कमान नहीं संभालेगा। सवाल है कि खामेनेई के बेटे देश का नेतृत्व क्यों नहीं कर सकते
ईरान की राजनीति का DNA है इंडियन? अयातुल्ला रूहोल्लाह खुमैनी का UP से है बहुत गहरा रिश्ता!
क्या इजरायल के साथ संघर्ष के दौरान अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या हो सकती है? इजरायल के अधिकारियों ने इस संभावना से इनकार तो नहीं किया है। हालांकि, ये इजरायल के हमले में ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के कमांडर की मौत के कुछ दिनों बाद ही उठने लगा। तब से, ग्लोबल अफेयर में रुचि रखने वाले लोग सोच रहे हैं कि अगर कुछ अनहोनी होती है, तो खामेनेई का उत्तराधिकारी कौन होगा? भले ही ईरान की राजनीति को समझने के लिए गहरे अध्ययन की जरूरत हो सकती है, लेकिन एक बात पर विशेषज्ञ आश्वस्त हैं कि उनका बेटा तो देश की कमान नहीं संभालेगा।
सवाल है कि खामेनेई के बेटे देश का नेतृत्व क्यों नहीं कर सकते? जवाब है- 30 ईरानी विशेषज्ञों के बीच किए गए BBC फारसी सर्वे में यह बात सामने आई है कि इस बात पर लोगों का भारी विश्वास है कि खामेनेई के दूसरे बेटे मोजतबा ही उनके उत्तराधिकारी होंगे, लेकिन देश के नियम शायद ऐसा होने न दें।
ईरान में कथित तौर पर 'राजा का बेटा ही राजा' या 'बादशाह का बेटा ही बादशाह' हो इसे "गैर-इस्लामी" मान जाता है। 1979 की क्रांति के प्रमुख अयातुल्ला रूहोल्लाह खुमैनी, जिन्होंने शाह को उखाड़ फेंका, उन्होंने वंशानुगत शासन की लगातार निंदा की, इसे एक नाजायज राजतंत्र के बराबर बताया।
खुमैनी के ये विचार 21 खंडों की किताब “Sahifeyeh Imam Khomeini” में दर्ज हैं, जिसमें उन्होंने अपने भाषणों और फतवों में बार-बार वंशवाद को खारिज किया। और यही कारण है कि खामेनेई का बेटा मोजतबा—even being powerful—शायद अगला सुप्रीम लीडर नहीं बन पाएगा।
खुमैनी: जिसने एक क्रांति को ज़िंदा किया, और एक मुल्क को बदल डाला
ईरान के हर स्कूल, हर नोट और हर गली में खुमैनी का चेहरा है। 1979 की इस्लामिक क्रांति जिसने शाह को उखाड़ फेंका – उसके पीछे एक आवाज थी, एक नाम था – आयातुल्लाह रुहुल्लाह खुमैनी।
अमेरिका की खुफिया एजेंसी CIA ने भी 1983 की अपनी रिपोर्ट में कहा था कि “अगर खुमैनी नहीं होते, तो क्रांति भी नहीं होती।” उनके टेप रिकॉर्डेड भाषणों ने, गरीबों और मजलूमों के दिलों में आग भर दी थी।
उनका स्टाइल ऐसा था – एक जैसी आवाज, दोहराव और लय, तीखे ताने और सटीक सियासी जुमले और भीड़ में बैठे लोग जो “नारे” लगाते थे ताकि उनका प्रभाव दोगुना हो जाए। उनका हर जुमला इस बात को दोहराता था, "इस्लाम ही सियासत है।"
... और ये क्रांति जुड़ी है भारत के एक छोटे से गांव से!
जो बात शायद बहुतों को नहीं पता – खुमैनी का रिश्ता भारत के उत्तर प्रदेश से जुड़ा है। उनके दादा सैयद अहमद मुसवी 'हिंदी' का जन्म यूपी के बाराबंकी जिले के किन्तूर गांव में हुआ था। 1830 में वो भारत से इराक, फिर ईरान पहुंचे
तेहरान के पास खुमैन नामक शहर में बस गए, वहीं तीन शादियां कीं, पांच बच्चे हुए। उन्हीं में से एक के बेटे बने रुहुल्लाह खुमैनी, जिन्होंने आगे चलकर पूरे ईरान की तस्वीर बदल दी। सैयद अहमद 'हिंदी' की कब्र कर्बला में है, लेकिन उनकी विरासत आज भी तेहरान की गूंज बनकर जिदा है।
अहमद हिंदी की बाराबंकी से ईरान तक की यात्रा और उनकी शिक्षाओं ने तेहरान के इतिहास को काफी प्रभावित किया। खोमैनी ईरान के पहले सर्वोच्च नेता के रूप में उभरे, जिन्होंने इसे एक धर्मशासित राज्य में बदल दिया।
अयातुल्ला रूहोल्लाह खुमैनी का भारत से संबंध
खुमैनी के दादा सैयद अहमद मुसावी, एक शिया धर्मगुरु, का जन्म उत्तर प्रदेश के बाराबंकी के पास किंटूर के छोटे से शहर में हुआ था। BBC पत्रकार बाकर मोइन ने बताया कि भारत से अपने संबंध को दर्शाने के लिए सैयद अहमद ने अपने उपनाम के रूप में ‘हिंदी’ का इस्तेमाल किया।
हिंदी 1830 में बाराबंकी से ईरान चले गए थे। उनके पिता दीन अली शाह 18वीं शताब्दी में पहले मध्य ईरान से भारत चले गए थे। अहमद हिंदी का जन्म 1800 के आसपास बाराबंकी के पास हुआ था, जो लखनऊ से लगभग 30 किलोमीटर पूर्व में है, उस समय जब मुगलों की हार के बाद ब्रिटिश औपनिवेशिक शक्ति बढ़ रही थी।
अहमद हिंदी इस्लामी पुनरुत्थान की धारणा से प्रेरित मौलवियों में से थे और उनका मानना था कि मुसलमानों को समाज में अपना उचित स्थान फिर से हासिल करने की जरूरत है।
रूहोल्लाह खुमैनी के दादा ने ईरान में 3 महिलाओं से शादी की थी
अहमद हिंदी ने बेहतर जीवन और अपने धर्म को आगे बढ़ाने के अवसर की तलाश में यात्रा शुरू की। 19वीं सदी की शुरुआत में, वे इराक के रास्ते ईरान पहुंचे, जिसे उस समय फारस के नाम से जाना जाता था। 1830 में, वे इराक के नजफ में अली के मकबरे पर जाने के लिए भारत से चले गए।
चार साल बाद, शिया धर्मगुरु ईरानी शहर खोमेन पहुंचे। उन्होंने एक घर खरीदा और वहां अपना परिवार बसाया, जो उनकी आस्था के प्रति समर्पण और उसे बढ़ावा देने की उनकी प्रतिबद्धता से प्रेरित था।
खोमेन में, उन्होंने तीन महिलाओं से शादी की और उनके पांच बच्चे हुए। पत्रकार बाकर की किताब के अनुसार, उनके एक बेटे, मुस्तफा, बाद में रूहोल्लाह खोमेनी के पिता बने, जिनका जन्म 1902 में हुआ था।
इस दौरान, ईरान कजर राजवंश के अधीन था और काफी उथल-पुथल का सामना कर रहा था। शासक वर्ग बढ़ते सार्वजनिक असंतोष और बढ़ते विदेशी दबाव के बीच अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा था।