जेपी मॉर्गन चेस ने पहली बार माना है कि उसने 6 जनवरी, 2021 को US Capitol पर हुए हमलों के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनके कई बिजनेसेज के बैंक अकाउंट बंद कर दिए थे। बैंक ने ऐसा राजनीतिक और कानूनी विवाद के बाद के हालात देखते हुए किया था। 6 जनवरी 2021 को U.S. Capitol पर ट्रंप समर्थकों ने हमला किया था।
एसोसिएटेड प्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यह बात जेपी मॉर्गन चेस और उसके लीडर जेमी डिमन के खिलाफ ट्रंप के मुकदमे में हाल ही में जमा की गई कोर्ट फाइलिंग में सामने आई। ट्रंप ने 5 अरब डॉलर का मुकदमा किया है। आरोप लगाया गया है कि उनके अकाउंट राजनीतिक कारणों से बंद कर दिए गए थे, जिससे उनके बिजनेस ऑपरेशंस में रुकावट आई।
जेपी मॉर्गन के पूर्व चीफ एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफिसर डैन विल्केनिंग ने कोर्ट फाइलिंग में लिखा, “फरवरी 2021 में जेपी मॉर्गन ने प्लेनटिफ को बताया था कि जेपी मॉर्गन के CB और PB में मेंटेन किए गए कुछ अकाउंट बंद कर दिए जाएंगे।” PB और CB का मतलब जेपी मॉर्गन का प्राइवेट बैंक और कमर्शियल बैंक है। अब तक, जेपी मॉर्गन ने कभी यह नहीं माना था कि उसने ट्रंप के अकाउंट बंद किए।
ट्रंप ने शुरू में जेपी मॉर्गन पर फ्लोरिडा स्टेट कोर्ट में केस किया था, जहां अब ट्रंप का मेन घर है। जेपी मॉर्गन चेस केस को न्यूयॉर्क शिफ्ट करने की कोशिश कर रहा है, जहां बैंक अकाउंट थे और जहां हाल तक ट्रंप के ज्यादातर बिजनेस ऑपरेशंस थे। ट्रंप ने बैंक पर ट्रेड में बदनामी का आरोप लगाया है। साथ ही जेमी डिमन पर फ्लोरिडा के अनफेयर एंड डिसेप्टिव ट्रेड प्रैक्टिस एक्ट का उल्लंघन करने का आरोप लगाया है।
ओरिजिनल केस में ट्रंप ने आरोप लगाया कि जेपी मॉर्गन की ओर से उनके अकाउंट बंद करने के बाद उन्होंने डिमन के साथ पर्सनली यह मसला उठाने की कोशिश की, और डिमन ने ट्रंप को भरोसा दिलाया कि वह पता लगा लेंगे कि क्या हो रहा है। केस में आरोप है कि डिमन ने ट्रंप के साथ फॉलो-अप नहीं किया। इसके अलावा, ट्रंप के वकीलों का आरोप है कि जेपी मॉर्गन ने ट्रंप और उनकी कंपनियों को एक रेप्युटेशनल “ब्लैकलिस्ट” में डाल दिया। इस लिस्ट का इस्तेमाल जेपी मॉर्गन और दूसरे बैंक, क्लाइंट्स को भविष्य में उनके साथ अकाउंट खोलने से रोकने के लिए करते हैं।
डीबैंकिंग तब होती है जब कोई बैंक किसी कस्टमर के अकाउंट बंद कर देता है या लोन या दूसरी सर्विस के रूप में कस्टमर के साथ बिजनेस करने से मना कर देता है। कभी फाइनेंस में एक कम जाना-पहचाना मुद्दा रहा डीबैंकिंग हाल के सालों में एक पॉलिटिकल मुद्दा बन गया है।