न्यूयॉर्क शहर के हार्लेम इलाके में लेजियोनेयर्स बीमारी के मामले तेजी से बढ़ने से दो लोगों की मौत हो गई और कम से कम 58 लोग इसकी चपेट आ गए हैं, शहर के स्वास्थ्य अधिकारी ने इसकी पुष्टि की है। पिछले हफ्ते इस बीमारी के 22 मामले और एक मौत की खबर आई थी, जो कुछ ही दिनों में दोगुने से ज्यादा हो गए। न्यूयॉर्क सिटी स्वास्थ्य विभाग ने प्रभावित इलाकों में रहने वाले सभी लोगों से अपील की है कि वे अगर फ्लू जैसे लक्षण महसूस कर रहे हैं, खासकर बुजुर्ग और पहले से बीमार लोग, तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।
एक्टिंग हेल्थ कमिश्नर डॉ. मिशेल मोर्स ने कहा, “अगर लेजियोनेयर्स बीमारी का जल्दी पता चल जाए, तो इसका इलाज संभव है। 50 साल से ज्यादा उम्र के लोग, धूम्रपान करने वाले और फेफड़ों की पुरानी बीमारी वाले लोग खासतौर पर सावधान रहें।”
लेजियोनेयर्स बीमारी क्या है?
लेजियोनेयर्स बीमारी निमोनिया का एक गंभीर रूप है, जो लेजियोनेला नाम के बैक्टीरिया की वजह से होता है। इसके लक्षण फ्लू या Covid-19 जैसे होते हैं, जैसे रोजाना खांसी आना, बुखार, ठंड लगना, मांसपेशियों में दर्द और सांस लेने में तकलीफ। अगर समय पर इलाज न हो तो यह बीमारी जानलेवा हो सकती है, खासकर उन लोगों के लिए जिनकी इम्यूनिटी कमजोर हो।
राहत की बात यह है कि ये बीमारी इंसान से इंसान में नहीं फैलती, लेकिन अगर जल्दी पकड़ में आ जाए तो एंटीबायोटिक्स से ठीक हो सकती है। इसलिए तेज से सही पहचान और इलाज बहुत जरूरी है।
लेजियोनेयर्स बीमारी कैसे फैलती है?
लेजियोनेला बैक्टीरिया गर्म पानी वाली जगहों में तेजी से बढ़ते हैं। ये बड़े एयर कंडीशनिंग सिस्टम के कूलिंग टॉवर्स, हॉट टब, ह्यूमिडिफायर, गर्म पानी के टैंक और जटिल पाइपलाइन सिस्टम में पाए जाते हैं। ये जगहें बैक्टीरिया के लिए अच्छा वातावरण होती हैं। हार्लेम में 11 कूलिंग टावरों में लेजियोनेला बैक्टीरिया पाया गया है, जो इस बीमारी का कारण बना।
लोग आमतौर पर उस पानी की भाप या धुंए को सांस के जरिए लेते हैं, जिसमें ये बैक्टीरिया होते हैं, जैसे एयर कंडीशनर, पब्लिक प्लेस पर लगे फव्वारे या भाप। यह बीमारी पीने के पानी से नहीं फैलती और न ही एक व्यक्ति से दूसरे में सीधे फैलती है।
'लेजियोनेयर्स' नाम क्यों पड़ा?
इस बीमारी का नाम 1976 में फिलाडेल्फिया में हुए एक अमेरिकी लीजन सम्मेलन से लिया गया है, जहां 34 लोग मरे और 200 से ज्यादा बीमार हुए। जांच में पता चला कि होटल के कूलिंग सिस्टम से दूषित पानी की बूंदें हवा में फैली थीं, जिससे यह बीमारी फैली। यह घटना इस बीमारी की पहली बड़ी पहचान थी और इसी से लेजियोनेला बैक्टीरिया की खोज हुई।