नेपाली PM बालेंद्र शाह के 'कब्जे' वाले विवादित बयान पर क्यों मचा है बवाल? जानें- भारत और नेपाल सीमा विवाद की पूरी जानकारी

India-Nepal Border Dispute: नेपाली प्रधानमंत्री बालेन शाह ने दावा किया है कि नेपाल ने भारत की जमीन पर कब्जा किया है। संसद भवन में आयोजित एक सवाल के जवाब में बालेन शाह ने कहा कि हमें चला कि न सिर्फ भारत ने नेपाल की जमीन पर कब्जा किया है। बल्कि नेपाल ने भी कई जगहों पर भारत की जमीन पर कब्जा किया है

अपडेटेड Jun 01, 2026 पर 3:30 PM
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India-Nepal Border Dispute: नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह की भारतीय भूमि पर 'अतिक्रमण' संबंधी टिप्पणी से विवाद शुरू हो गया है

India-Nepal Border Dispute: नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने रविवार (30 मई) को कहा कि उन्हें उनके देश द्वारा भारत के कुछ क्षेत्रों पर अतिक्रमण करने के बारे में पता चला है। उन्होंने यह टिप्पणी लंबे समय से चले आ रहे भारत-नेपाल सीमा विवाद पर संसद में सवालों के जवाब देने के दौरान की। संसद के 11 मई को शुरू हुए मौजूदा सत्र में अपनी पहली उपस्थिति में शाह ने आगे कहा कि भारत और नेपाल ने इतिहासकारों, सर्वेक्षकों और विशेषज्ञों की मदद लेकर समाधान खोजने पर सहमति जताई है। उन्होंने कहा कि काठमांडू ने इस मामले को चीन और ब्रिटेन के साथ भी उठाया है।

नेपाल और भारत के बीच लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी को लेकर पुराना सीमा विवाद है। इसमें दोनों देश अपना दावा करते हैं। भारत का कहना है कि ये क्षेत्र उत्तराखंड का हिस्सा हैं। इस मुद्दे को द्विपक्षीय बातचीत के माध्यम से हल किया जाना चाहिए। नई दिल्ली ने रविवार को नेपाल के प्रधानमंत्री की टिप्पणियों पर तत्काल कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

लेकिन इस महीने की शुरुआत में भारत ने लिपुलेख दर्रे से होकर गुजरने वाली आगामी कैलाश मानसरोवर यात्रा पर नेपाल की आपत्ति को खारिज कर दिया था। भारत ने कहा कि नई दिल्ली इसे अस्वीकार्य मानती है।


बालेन शाह ने क्या कहा?

बालेन शाह ने दावा किया है कि नेपाल ने भारत की जमीन पर कब्जा किया है। संसद भवन में आयोजित एक सवाल के जवाब में बालेन शाह ने कहा, "प्रधानमंत्री बनने के बाद मुझे पता चला कि न सिर्फ भारत ने नेपाल की जमीन पर कब्जा किया है। बल्कि नेपाल ने भी कई जगहों पर भारत की जमीन पर कब्जा किया है।"

शाह ने संसद को बताया, "नेपाल सरकार ने भारत को आधिकारिक तौर पर एक राजनयिक नोट भेजा है, जिसमें भारत द्वारा लिपुलेख सहित विभिन्न क्षेत्रों पर अतिक्रमण के मुद्दे का उल्लेख किया गया है। हमें उनका जवाब पहले ही मिल चुका है। दोनों देशों ने इतिहासकारों, सर्वेक्षकों और संबंधित विशेषज्ञों की मदद से राजनयिक माध्यमों से एक साथ बैठकर इस मुद्दे को हल करने पर सहमति जताई है।”

जब एक सांसद ने लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी क्षेत्रों से संबंधित विवाद पर सरकार के दृष्टिकोण के बारे में पूछा, तो शाह ने कहा कि केवल भारत ने ही अतिक्रमण नहीं किया। बल्कि नेपाल ने भी भारत के साथ ऐसा ही किया है।

शाह ने आगे कहा, "आपको एक तथ्य जानकर आश्चर्य होगा, जो मुझे प्रधानमंत्री बनने के बाद ही पता चला है। भारत ने न केवल नेपाली क्षेत्रों पर अतिक्रमण किया है, बल्कि नेपाल ने भी कई स्थानों पर भारत के क्षेत्रों पर अतिक्रमण किया है। अब दोनों देशों को तथ्यों का अध्ययन करना चाहिए और मित्रवत एक साथ बैठकर इस मुद्दे का हल करना चाहिए।"

नेपाल ने चीन और ब्रिटेन से चर्चा

नेपाली प्रधानमंत्री ने कहा कि काठमांडू ने इस मुद्दे पर चीन और ब्रिटेन के साथ राजनयिक चर्चा भी की। ये तीनों स्थान भारत, तिब्बत और नेपाल के त्रिकोणीय प्वाइंट के पास स्थित हैं। प्रधानमंत्री शाह ने कहा कि उन्होंने ब्रिटेन के साथ यह मामला इसलिए उठाया, क्योंकि यह उस दौर से जुड़ा है जब ब्रिटिश सरकार ने इस क्षेत्र को छोड़ दिया था। नेपाल द्वारा भारतीय क्षेत्रों पर अतिक्रमण करने के संबंध में शाह की टिप्पणियों से विवाद खड़ा हो गया है।

नेपाली कांग्रेस के बसाना थापा और नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के रमेश मल्ला सहित विपक्षी सांसदों ने शाह की टिप्पणियों पर आपत्ति जताई। साथ ही मांग की है कि उन्हें संसदीय रिकॉर्ड से हटा दिया जाए। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री को या तो अपने इस दावे के समर्थन में सबूत पेश करने चाहिए कि नेपाल ने भारतीय क्षेत्र पर अतिक्रमण किया है या फिर अपना बयान वापस लेना चाहिए।

नेपाल में ही माफी की मांग

खबरों के मुताबिक, नेपाल के पूर्व विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञवाली ने भी शाह से माफी मांगने की मांग की है। नेपाल के कई सोशल मीडिया यूजर्स इसकी आलोचना कर रहे हैं। जबकि विशेषज्ञों ने इसे खारिज कर दिया है। भारत में नेपाल के पूर्व राजदूत नीलंबरा आचार्य ने 'कांतिपुर' ऑनलाइन मीडिया पोर्टल को बताया कि शाह के पास नेपाल द्वारा भारतीय क्षेत्रों पर अतिक्रमण किए जाने के संबंध में कोई जानकारी नहीं है।"

भारत-नेपाल सीमा विवाद की पूरी जानकारी

आचार्य के अनुसार, दोनों पक्षों के बीच 97 प्रतिशत सीमा विवाद पहले ही सुलझ चुके हैं। लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो अब भी लंबित हैं। उन्होंने कहा कि कुछ सीमावर्ती क्षेत्रों में सीमा स्तंभों के न होने के कारण कुछ नेपाली लोगों द्वारा भारत में और कुछ भारतीयों द्वारा नेपाल में भूमि का उपयोग करने की खबरें हैं। लेकिन नेपाल सरकार ने स्वयं भारत के क्षेत्र पर अतिक्रमण नहीं किया है। भारत में नेपाल के एक अन्य पूर्व राजदूत दीप कुमार उपाध्याय ने कहा कि नेपाल द्वारा भारत की धरती पर अतिक्रमण का कोई रिकॉर्ड नहीं है।

नेपाल-भारत सीमा विशेषज्ञ और प्रख्यात भूगोलवेत्ता बुद्धि नारायण श्रेष्ठ ने भी नेपाल द्वारा भारतीय क्षेत्रों पर अतिक्रमण करने के संबंध में प्रधानमंत्री के बयान को खारिज कर दिया है। उन्होंने कहा कि नेपाल ने कभी भारतीय क्षेत्रों पर अतिक्रमण नहीं किया है। और न ही सीमावर्ती क्षेत्रों में अपना कब्जा बढ़ाया है।

उन्होंने यह भी कहा कि कुछ सीमावर्ती क्षेत्रों में सीमा पार खेतों के कारण दोनों देशों के किसान एक-दूसरे की जमीन का इस्तेमाल करते रहे हैं। इस महीने की शुरुआत में नेपाल के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लोक बहादुर छेत्री ने कहा था कि उनका देश राजनयिक चैनलों के माध्यम से भारत के साथ सीमा मुद्दे को हल करने के लिए प्रतिबद्ध है।

भारत-चीन युद्ध के बाद हुआ बड़ा बदलाव

तिब्बत पर चीन के कब्जे और भारत-चीन युद्ध के बाद सीमा पर जमीन को लेकर विवाद का रणनीतिक महत्व बढ़ गया। इस क्षेत्र की तिब्बत से नजदीकी और लिपुलेख दर्रे के महत्व को देखते हुए भारत ने इस इलाके में अपनी सुरक्षा मौजूदगी को मज़बूत किया। दशकों तक यह मुद्दा काफी हद तक इलाका शांत रहा। नेपाल ने 1990 के दशक में इसे और अधिक औपचारिक रूप से उठाना शुरू किया। हाल के वर्षों में अपनी आपत्तियों को तेज़ कर दिया। काठमांडू ने 2015 में लिपुलेख दर्रे पर भारत-चीन की आपसी सहमति पर आपत्ति जताई।

फिर 2019 में भारत के राजनीतिक नक्शे का विरोध किया और 2020 में धारचूला-लिपुलेख सड़क के उद्घाटन का विरोध किया। इसके जवाब में नेपाल ने एक नया राजनीतिक नक्शा जारी किया जिसमें कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को अपने क्षेत्र में शामिल किया गया था। तब से यह विवाद लगातार टकराव का एक मुद्दा बना हुआ है। हालांकि, दोनों पक्षों ने बार-बार कहा है कि इसे बातचीत के जरिए सुलझाया जाना चाहिए।

यह क्षेत्र भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

यह विवादित क्षेत्र एक रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जंक्शन पर स्थित है जो भारत, नेपाल और चीन को जोड़ता है। इसका ऊंचाई वाला इलाका आस-पास के रास्तों का स्पष्ट नजारा देता है, जिससे यह निगरानी और मैनेजमेंट से काफी मूल्यवान हो जाता है। कालापानी सेक्टर पर नियंत्रण होने से भारतीय सेनाएं लिपुलेख दर्रे और तिब्बती पठार के पास के आसपास के इलाकों में होने वाली गतिविधियों पर नज़र रख पाती हैं।

लिपुलेख दर्रा अपने आप में रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सीमा पर किसी भी आपात स्थिति में सैनिकों और साजो-सामान की आवाजाही को आसान बना सकता है। भारत ने इस क्षेत्र में इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट में निवेश किया है, जिसमें धारचूला-लिपुलेख सड़क भी शामिल है। ताकि आगे के इलाकों तक संपर्क और पहुंच को बेहतर बनाया जा सके।

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इस दर्रे का धार्मिक महत्व भी है। यह कैलाश मानसरोवर यात्रा के मुख्य रास्तों में से एक है, जिसे हर साल तिब्बत जाने वाले भारतीय तीर्थयात्री करते हैं। लेटेस्ट रिपोर्ट के मुताबिक, भारत इस मुद्दे को सीमा सुरक्षा, सैन्य तैयारियों, इंफ्रास्ट्रक्चर के संपर्क और धार्मिक पहुंच के नजरिए से देखता है। जबकि नेपाल लगातार यह दावा करता रहा है कि ऐतिहासिक सबूत उसके क्षेत्रीय दावे का समर्थन करते हैं।

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