Eid al-Adha in Gaza: दुनिया भर के मुस्लिम जहां हर्षोल्लास के साथ ईद-उल-अजहा यानी बकरीद मनाने की तैयारियों में जुटे हैं, वहीं गाजा पट्टी में इस त्योहार का रंग पूरी तरह फीका पड़ा हुआ है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, इजरायल के साथ जारी इस विनाशकारी जंग के बीच गाजा के लोग अपने घरों से दूर शिविर कैंपों और टेंटों में लगातार तीसरी ईद मनाने को मजबूर हैं।
इस बार न तो बाजारों में कुर्बानी के लिए मवेशी बचे हैं, न ही लोगों के पास उन्हें खरीदने के पैसे। अपनों को खोने का गम और भुखमरी जैसी स्थिति के बीच भी गाजा के फिलिस्तीनी किसी तरह उम्मीद का दामन थामे हुए हैं।
₹20000 की भेड़ मिल रही ₹6 लाख में
उत्तरी गाजा के बेत लाहिया से विस्थापित और 5 बच्चों के पिता इमाद सुह्वैल अल जजीरा को
बताते हैं कि इस बार बाजारों से मवेशी पूरी तरह गायब हैं। इमाद के मुताबिक, 'हर साल हम भेड़ या बछड़े की कुर्बानी देते थे, साथ मिलकर खाते थे और गरीबों में मांस बांटते थे। लेकिन आज लोग दो किलो सब्जी तक नहीं खरीद पा रहे हैं, बुनियादी जरूरतें पूरी करना नामुमकिन हो गया है'।
गाजा में मवेशी न के बराबर बचे हैं। जो भेड़ जंग से पहले करीब ₹46000 से ₹58000 में मिलती थी, उसकी कीमत अब बढ़कर करीब ₹3.7 लाख से ₹4 लाख हो चुकी है। कुछ मवेशियों की कीमत तो ₹5 लाख से ज्यादा तक मांगी जा रही है।
'पिछले साल डिब्बाबंद मीट खाया, इस बार शायद मुर्गे की कुर्बानी दें'
63 वर्षीय फौजी हमदान भी अपनी पत्नी के साथ हज पर जाने के लिए पैसे बचा रहे थे, लेकिन जंग के हालातों ने उन्हें टेंट में ला खड़ा किया। पिछले साल गाजा में कई लोगों ने अकाल जैसे हालातों के बीच ईद गुजारी थी। फौजी मजाक कड़वे लहजे में कहते हैं, 'पिछले साल मैंने असली कुर्बानी की जगह डिब्बाबंद मीट खाकर काम चलाया था। इस साल पता नहीं क्या होगा, शायद हमारे लिए मुर्गे की कुर्बानी देना ही जायज हो जाए या फिर फ्रोजन मीट खरीदना पड़े?'
90% से ज्यादा मवेशी फार्म तबाह, बच्चों के लिए कपड़े तक नहीं
गाजा के चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के आंकड़ों के मुताबिक, अक्टूबर 2023 से शुरू हुई इस जंग में गाजा का लाइवस्टॉक सेक्टर पूरी तरह बर्बाद हो चुका है। इजरायली हमलों और कड़े प्रतिबंधों के कारण गाजा के 90 प्रतिशत से अधिक मवेशी फार्म या तो नष्ट हो चुके हैं या उन्हें भारी नुकसान पहुंचा है। इसके अलावा इजरायल ने बाहर से भी जीवित जानवरों की एंट्री पर पूरी तरह रोक लगा रखी है।
बाजारों में सामान नहीं है और जो है उसकी कीमतें इतनी ज्यादा हैं कि आम लोग बच्चों के लिए ईद के नए कपड़े तक नहीं खरीद पा रहे हैं। लोग बुनियादी मदद के लिए कतारों में खड़े होने को मजबूर हैं।