Indus Waters Treaty: पाकिस्तान को महंगा पड़ा भारत से पंगा, सिंधु जल समझौते के मुकदमे में खुद भर रहा भारत के हिस्से का बिल

Indus Waters Treaty: एक रिपोर्ट के मुताबिक, नई दिल्ली द्वारा कार्यवाही में अपनी भागीदारी रोकने और संधि को ठंडे बस्ते में डालने के बाद पाकिस्तान सिंधु जल संधि से जुड़े विवाद में अपनी और भारत, दोनों की आर्बिट्रेशन (मध्यस्थता) लागत उठा रहा है। जानकारों का कहना है कि अभी इस माममें में लागत बढ़ने की उम्मीद है

अपडेटेड Jul 17, 2026 पर 3:54 PM
Indus Waters Treaty: सिंधु जल समझौते को लेकर भारत से पंगा लेना पाकिस्तान को भारी पड़ता दिख रहा है

Indus Waters Treaty: सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच चल रहे विवाद में शहबाज शरीफ सरकार को बड़ा वित्तीय झटका लगा है। एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत द्वारा मध्यस्थता प्रक्रिया से दूरी बनाने के बाद पाकिस्तान न केवल अपना बल्कि भारत के हिस्से का भी मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) खर्च वहन कर रहा है। 'इकोनॉमिक टाइम्स' की रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान अब तक 6 लाख डॉलर (600,000 डॉलर) से अधिक खर्च कर चुका है। जानकारों का कहना है कि जैसे-जैसे मामला आगे बढ़ेगा, यह राशि और बढ़ सकती है।

क्या है पूरा मामला?

सिंधु जल संधि के तहत किसी भी मध्यस्थता प्रक्रिया का खर्च भारत और पाकिस्तान को बराबर-बराबर उठाना होता है। लेकिन अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने मध्यस्थता में अपनी भागीदारी निलंबित कर दी। भारत ने कहा कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ विश्वसनीय और अपरिवर्तनीय कार्रवाई नहीं करता, तब तक संधि को स्थगित (abeyance) माना जाएगा। इसके बावजूद पाकिस्तान ने परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (PCA) में कार्यवाही जारी रखी, जिसके कारण उसे दोनों देशों के हिस्से का खर्च भी उठाना पड़ रहा है।


किस मुद्दे पर है विवाद?

यह विवाद भारत की किशनगंगा और रतले जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर है, जो सिंधु जल संधि के तहत पश्चिमी नदियों पर बनाई जा रही हैं। पाकिस्तान का आरोप है कि ये परियोजनाएं संधि के प्रावधानों का उल्लंघन करती हैं। जबकि भारत का कहना है कि ऐसे तकनीकी विवादों का समाधान न्यूट्रल एक्सपर्ट के माध्यम से होना चाहिए, न कि कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के जरिए। भारत का यह भी तर्क है कि दोनों विवाद को एक साथ चलाना संधि की मूल व्यवस्था के खिलाफ है।

भारत ने PCA की वैधता पर भी उठाए सवाल

भारत ने परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के अधिकार क्षेत्र (ज्यूरिस्डिक्शन) को स्वीकार करने से इनकार करते हुए इसे अवैध रूप से गठित न्यायाधिकरण बताया है। भारत का कहना है कि PCA द्वारा दिया गया कोई भी फैसला उसके लिए 'शून्य और अमान्य' होगा। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता नियमों के अनुसार यदि कोई पक्ष कार्यवाही में शामिल नहीं होता, तब भी ट्रिब्यूनल अपने अधिकार क्षेत्र को सही मानते हुए सुनवाई जारी रख सकता है। PCA पहले ही यह निर्णय दे चुका है कि उसे पाकिस्तान की याचिका सुनने का अधिकार है, जबकि भारत लगातार इस प्रक्रिया से बाहर है।

पाकिस्तान पर बढ़ता आर्थिक बोझ

रिपोर्ट के अनुसार, जब तक पाकिस्तान इस मध्यस्थता प्रक्रिया को आगे बढ़ाता रहेगा और भारत इसमें शामिल नहीं होगा, तब तक पाकिस्तान को दोनों पक्षों का पूरा मध्यस्थता खर्च उठाना पड़ सकता है। इससे सिंधु जल संधि विवाद में पाकिस्तान पर आर्थिक दबाव लगातार बढ़ने की संभावना है।

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