'न खाना, न इंटरनेट और सैकड़ों जेल में बंद...', PoK में प्रदर्शन पर बौखलाया पाकिस्तान, सेना का ये क्रूर चेहरा बेनकाब

PoK Protests: पाकिस्तान के PoK में बीते कई दिनों से भयंकर प्रोटेस्ट जारी है। इस बीच सेना ने एक जनाजे के दौरन फायर झोंक दिया जिसमें 30 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई। इस एक्शन के बाद से वहां और बड़े लेवल पर विद्रोह शुरू हो गए हैं

अपडेटेड Jun 09, 2026 पर 12:35 PM
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पाकिस्तान को डर है कि उसकी बदहाली की तस्वीरें दुनिया के सामने न आ जाएं, इसलिए उसने डिजिटल सेंसरशिप का पैंतरा आजमाया है

PoK Massive Protests: पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में हालात बेकाबू हो चुके हैं। और अपनी नाकामी को छिपाने के लिए पाकिस्तानी हुकूमत ने वहां दमन की कार्यवाई तेज कर दी है। रावलकोट समेत पीओके के कई बड़े शहरों में जारी भारी अशांति के बीच, वहां के सोशल एक्टिविस्ट, विपक्षी नेताओं और कश्मीरी प्रवासियों ने पाकिस्तानी प्रशासन पर बड़े गंभीर आरोप लगाए हैं।

पीओके में विरोध प्रदर्शनों की अगुवाई कर रहे संगठन 'जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी' (JAAC) ने आज 9 जून को पूरे क्षेत्र में एक बड़े प्रदर्शन का ऐलान किया है। उनका आरोप है कि पिछले छह दिनों से पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों और एक्टिविस्ट्स के खिलाफ एक हिंसक और क्रूर क्रैकडाउन शुरू कर रखा है।

450 से ज्यादा लोग गिरफ्तार, कई प्रदर्शनकारी लापता


जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी के नेताओं के मुताबिक, जब से यह जन-आंदोलन शुरू हुआ है, तब से लेकर अब तक पाकिस्तानी सुरक्षा बल 450 से ज्यादा लोगों को हिरासत में या गिरफ्तार कर चुके हैं।

हद तो यह है कि रावलकोट के कंबाइंड मिलिट्री हॉस्पिटल के बाहर प्रदर्शन करने वाले कई कार्यकर्ता और आम मजदूर अब भी लापता हैं, जिनका कोई सुराग नहीं मिल रहा है। एक्टिविस्ट्स का कहना है कि न तो जेलों में बंद लोगों को ढंग का खाना दिया जा रहा है और न ही बुनियादी मानवाधिकारों का पालन हो रहा है।

इंटरनेट और मोबाइल नेटवर्क पर ताला, घरों में छापेमारी

पाकिस्तान को हमेशा से डर रहता है कि उसकी बदहाली की तस्वीरें दुनिया के सामने न आ जाएं, इसलिए उसने डिजिटल सेंसरशिप का पुराना पैंतरा आजमाया है। स्थानीय गुटों के अनुसार, मुजफ्फराबाद, रावलकोट, पुंछ, मीरपुर और नीलम घाटी जैसे प्रमुख हिस्सों में इंटरनेट सेवाएं, मोबाइल नेटवर्क और संचार के तमाम माध्यम पूरी तरह ठप कर दिए गए हैं।

इसके साथ ही, रात के अंधेरे में लोगों के घरों पर छापेमारी की जा रही है और प्रदर्शनकारियों को जबरन उठाकर जेलों में ठूंसा जा रहा है।

क्या फिर दोहराएगा 1971 का इतिहास?

प्रदर्शनकारियों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने पाकिस्तान के इस अमानवीय रवैये की तुलना इतिहास के उस काले पन्ने से की है, जिसके कारण साल 1971 में बांग्लादेश का जन्म हुआ था। एक्टिविस्ट्स का तर्क है कि जनता की जायज राजनीतिक और आर्थिक मांगों को बंदूकों के दम पर दबाने की पाकिस्तान की यह पुरानी आदत, इस बार जनता के गुस्से को और ज्यादा भड़का देगी।

अवामी एक्शन कमेटी ने एक और बड़ा दावा करते हुए कहा है कि रावलकोट में रविवार को हुई हिंसा में मरने वालों की संख्या बढ़कर 35 हो गई है। दर्जनों लोग गंभीर रूप से घायल हैं, हालांकि स्वतंत्र सूत्रों से इन आंकड़ों की पुष्टि होना अभी बाकी है।

दुनिया भर में हो थी पाक की थू-थू

पाकिस्तान की इस बर्बरता के खिलाफ अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी आवाजें उठने लगी हैं। ब्रिटेन, अमेरिका और अन्य देशों में रह रहे कश्मीरी प्रवासी संगठनों ने पाकिस्तानी सेना और वहां की सरकार के खिलाफ बड़े पैमाने पर प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं। उन्होंने पाकिस्तान के सिविल-मिलिट्री एस्टेब्लिशमेंट पर असहमति की आवाज को कुचलने का आरोप लगाया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान में मौजूद अमेरिकी दूतावास समेत कई अन्य विदेशी मिशन भी पीओके के इन गंभीर हालातों पर बारीक नजर रख रहे हैं। यानी वैश्विक मंच पर एक बार फिर पाकिस्तान बेनकाब होने की कगार पर है।

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