PoK में पाकिस्तानी सेना ने प्रदर्शनकारियों पर चलाई अंधाधुंध गोलियां, 12 लोगों की मौत

स्थानीय मीडिया रिपोर्टों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुसार, 'जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी' (जेएएसी) से जुड़े प्रदर्शनकारियों पर पाकिस्तानी सुरक्षा बलों द्वारा की गई गोलीबारी में कम से कम 12 लोगों की मौत हो गई है। इस घटना के बाद इलाके में तनाव और बढ़ गया है तथा पाकिस्तानी सेना पर कई गंभीर आरोप लगे हैं

अपडेटेड Jun 09, 2026 पर 3:44 PM
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर यानी PoK में पाक सेना का चेहरा एक बार फिर बेनकाब हो गया है।

पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर यानी PoK में पाक सेना का चेहरा एक बार फिर बेनकाब हो गया है। पाकिस्तानी सेना ने यहां प्रदर्शन कर रहे लोगों पर अंधाधुंध फायरिंग की, जिसमें कम से कम 12 लोगों की मौत हो गई है। वहीं 100 से अधिक लोग घायल बताए जा रहे हैं। PoK में जम्मू-कश्मीर संयुक्त अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) ने आज यानी 9 जून को लॉन्ग मार्च बुलाया था। JAAC यहां का सबसे बड़े नागरिक अधिकार संगठन है जिसने इस क्षेत्र में शासन, सब्सिडी और बुनियादी अधिकारों को लेकर लंबे समय तक विरोध-प्रदर्शन किए हैं।

पाकिस्तानी सेना ने चलाई अंधाधुंध गोलियां 

स्थानीय मीडिया रिपोर्टों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुसार, 'जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी' (जेएएसी) से जुड़े प्रदर्शनकारियों पर पाकिस्तानी सुरक्षा बलों द्वारा की गई गोलीबारी में कम से कम 12 लोगों की मौत हो गई है। इस घटना के बाद इलाके में तनाव और बढ़ गया है तथा पाकिस्तानी सेना पर कई गंभीर आरोप लगे हैं। बताया जा रहा है कि यह विवाद पीओके सरकार द्वारा जेएएसी पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद शुरू हुआ। जेएएसी एक जनआंदोलन से जुड़ा संगठन है, जो पिछले कुछ वर्षों से बढ़ती महंगाई, महंगी बिजली, कर नीतियों और क्षेत्र की कथित उपेक्षा जैसे मुद्दों को लेकर आवाज उठाता रहा है।


संगठन के समर्थकों का कहना है कि वह आम लोगों की समस्याओं को सामने लाने का काम कर रहा था। वहीं, प्रतिबंध और उसके बाद हुई कार्रवाई ने इलाके में लोगों के बीच नाराजगी बढ़ा दी है। ताजा घटनाओं के बाद क्षेत्र की स्थिति पर सभी की नजर बनी हुई है।

आसिम मुनीर के खिलाफ सड़कों पर उतरे लोग

जानकारी के मुताबिक, मीरपुर क्षेत्र में सुरक्षा बलों ने करीब 90 लोगों को हिरासत में लिया और अभियान के दौरान कुछ हथियार भी बरामद किए। प्रशासन का दावा है कि हिंसा को रोकने और हालात को नियंत्रण में रखने के लिए ये कदम उठाना जरूरी था। दूसरी ओर, प्रदर्शनकारियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विदेशों में रहने वाले कश्मीरी समुदाय के लोगों ने सरकार के दावों को खारिज किया है। उनका आरोप है कि सुरक्षा बलों ने ज्यादातर निहत्थे लोगों के खिलाफ जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग किया। उनका यह भी कहना है कि विरोध प्रदर्शनों और मृतकों के अंतिम संस्कार के दौरान निकाले गए जुलूसों में शामिल लोगों को भी निशाना बनाया गया।

सरकारी सूत्रों के मुताबिक, पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर के नेतृत्व में इस कार्रवाई की गति बढ़ी है। सूत्रों का दावा है कि सेना के वरिष्ठ अधिकारी जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (जेएएसी) के आंदोलन को एक राजनीतिक चुनौती के रूप में देख रहे हैं और इसे नियंत्रित करने के लिए कड़ा रुख अपना रहे हैं। बताया जा रहा है कि सबसे गंभीर घटना रावलकोट में हुई, जहां प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच हुई झड़प में कई लोगों की जान चली गई। सूत्रों का यह भी कहना है कि यह अभियान पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में होने वाले आगामी चुनावों से पहले सरकार के खिलाफ बढ़ रहे असंतोष को रोकने की व्यापक रणनीति का हिस्सा हो सकता है।

अस्पताल में मौजूद लोगों पर भी फायरिंग 

सामाजिक कार्यकर्ताओं और विभिन्न संगठनों का कहना है कि मौजूदा घटनाएं 2024 और 2025 में हुई पिछली झड़पों जैसी ही हैं। उनका आरोप है कि यह सार्वजनिक विरोध प्रदर्शनों पर सख्ती से कार्रवाई करने के पुराने तरीके का ही हिस्सा है। कुछ लोगों ने इन घटनाओं को सरकारी दमन के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक बताया है, हालांकि इस मुद्दे पर अलग-अलग राजनीतिक राय मौजूद हैं। इस बीच, कुछ गंभीर आरोप भी सामने आए हैं। सूत्रों के अनुसार, सुरक्षा बलों पर अस्पतालों और अंतिम संस्कार में जुटी भीड़ के आसपास गोलीबारी करने के आरोप लगाए गए हैं। दावा किया जा रहा है कि इससे आम नागरिकों की मौतों की संख्या आधिकारिक आंकड़ों से अधिक हो सकती है। हालांकि प्रशासन ने इन आरोपों की पुष्टि नहीं की है।

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि वास्तविक मौतों का आंकड़ा बताई गई संख्या से काफी ज्यादा हो सकता है। कुछ लोगों का अनुमान है कि हाल के महीनों में 100 से अधिक लोगों की जान गई है। इन घटनाओं के बाद पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर की स्थिति एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गई है। कई मानवाधिकार संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हिंसा और प्रदर्शनकारियों के साथ हुए व्यवहार की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है।

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