अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध का सीधा असर यूनाइटेड अरब अमीरात (UAE) में रहने वाले शिया मुसलमानों पर पड़ रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार, UAE ने पाकिस्तान के हजारों शिया मुसलमानों को वापस उनके देश भेज दिया है। यूनाइटेड अरब अमीरात (UAE) में सिक्योरिटी ऑफिसर के तौर पर काम करने वाले एक पाकिस्तानी शिया मुस्लिम ने अपने गांव लौटने के बाद बताया कि ईरान और अमेरिका-इज़राइल युद्ध के बाद कई लोगों को UAE से डिपोर्ट कर दिया गया।
ईरान युद्ध के बीच UAE ने लिया ऐसा एक्शन
कई दशकों से UAE लाखों पाकिस्तानी कामगारों के लिए रोजगार और बेहतर जिंदगी का बड़ा केंद्र रहा है। वहां पाकिस्तानी लोग निर्माण कार्य, ट्रांसपोर्ट, दुकानों और सर्विस सेक्टर में काम करते रहे हैं।लेकिन अब हजारों पाकिस्तानी शिया मुसलमानों का कहना है कि उन्हें UAE से बाहर निकाला जा रहा है। उनका दावा है कि ईरान युद्ध के बाद बढ़े तनाव, UAE और पाकिस्तान के बिगड़ते रिश्तों और शिया समुदाय को लेकर बढ़ते शक की वजह से यह कार्रवाई हो रही है।
शिया मुसलमानों को देश से खदेड़ा!
हालांकि पाकिस्तान सरकार सार्वजनिक तौर पर बड़े स्तर पर लोगों को निकाले जाने की बात से इनकार कर रही है, लेकिन शिया नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और UAE से लौटे कामगारों का आरोप है कि वहां पाकिस्तानी शिया समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है। उनका कहना है कि ईरान और खाड़ी क्षेत्र के तनाव बढ़ने के बाद UAE में पाकिस्तानी शियाओं पर निगरानी, हिरासत और डिपोर्ट करने की कार्रवाई तेज हो गई है। यह भी कहा जा रहा है कि पाकिस्तान की अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ बनने की कोशिशों के बाद हालात और संवेदनशील हो गए। इन घटनाओं ने दिखाया है कि पाकिस्तान की विदेश नीति में बढ़ता दबाव अब सीधे आम मजदूरों पर असर डाल रहा है। खासकर उन कामगारों पर, जिनके विदेश से भेजे गए पैसे पाकिस्तान की कमजोर अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम माने जाते हैं।
पाकिस्तानी शिया समुदाय का कहना है कि उन्हें UAE में खास तौर पर निशाना बनाया जा रहा है। न्यूयॉर्क टाइम्स, मिडिल ईस्ट आई और रॉयटर्स की रिपोर्ट्स के मुताबिक, हाल के महीनों में हजारों पाकिस्तानी शिया परिवारों को या तो UAE से डिपोर्ट कर दिया गया है या फिर दोबारा वहां आने की अनुमति नहीं दी गई। पाकिस्तानी शिया राजनीतिक संगठन ‘मजलिस वाहदत-ए-मुसलमीन’ का दावा है कि उसने डिपोर्ट किए गए लोगों का एक रिकॉर्ड तैयार किया है। संगठन के मुताबिक, 28 फरवरी के बाद से करीब 7,500 पाकिस्तानी शियाओं को UAE से निकाला गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह कार्रवाई उस समय तेज हुई, जब अमेरिका और इज़राइल ने ईरान पर हमले किए थे और क्षेत्र में तनाव बढ़ गया था।
शिया धर्मगुरु ने दिया बड़ा बयान
इस्लामाबाद के मशहूर शिया धर्मगुरु मोहम्मद अमीन शहीदी ने न्यूयॉर्क टाइम्स से बातचीत में कहा कि सिर्फ उनके संगठन ने ही UAE से निकाले गए करीब 5,000 पाकिस्तानी शिया परिवारों का रिकॉर्ड तैयार किया है। उन्होंने मिडिल ईस्ट आई से बात करते हुए कहा कि असली संख्या इससे भी ज्यादा हो सकती है। शहीदी के मुताबिक, खाड़ी देशों में यह सोच बन गई है कि हर शिया ईरान का समर्थक होता है। उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान सरकार से मदद की उम्मीद करना मुश्किल है, क्योंकि पाकिस्तान और UAE के रिश्ते पहले जैसे मजबूत नहीं रहे हैं।
मोहम्मद अमीन शहीदी ने कहा कि पाकिस्तान सरकार से UAE के सामने यह मुद्दा उठाने की उम्मीद करना बेकार है, क्योंकि दोनों देशों के रिश्ते काफी खराब हो चुके हैं। हालांकि, पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने इन आरोपों को खारिज किया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने न्यूयॉर्क टाइम्स से कहा कि अगर किसी व्यक्ति को UAE से निकाला गया है, तो उसका कारण सिर्फ आपराधिक गतिविधियां हैं। उन्होंने इस बात से इनकार किया कि शिया समुदाय को खास तौर पर निशाना बनाया जा रहा है।
खाड़ी देशों में शिया समुदाय को लेकर शक और अविश्वास की भावना नई नहीं है। यह स्थिति मौजूदा संघर्ष शुरू होने से काफी पहले से बनी हुई है। 1979 में ईरान में शिया धर्मगुरुओं के नेतृत्व में इस्लामी क्रांति हुई थी। इसके बाद खाड़ी के कई राजशाही देशों ने शिया धार्मिक और राजनीतिक समूहों को ईरान के बढ़ते प्रभाव और उसकी विचारधारा से जोड़कर देखना शुरू कर दिया। 2011 में अरब देशों में शुरू हुए ‘अरब स्प्रिंग’ आंदोलनों के बाद खाड़ी देशों की चिंताएं और बढ़ गई थीं। इन देशों को डर था कि शिया समुदाय के जरिए ईरान का प्रभाव बढ़ सकता है।
इस चिंता की एक बड़ी वजह ‘विलायत अल-फकीह’ का सिद्धांत है, जिसे ईरान के नेता अयातुल्ला रूहोल्ला खोमैनी ने आगे बढ़ाया था। इस सिद्धांत के अनुसार, ईरान के सर्वोच्च नेता को शिया मुसलमानों पर बड़ा धार्मिक अधिकार माना जाता है। हालांकि दुनिया के कई शिया मुसलमान इस विचार को नहीं मानते, लेकिन खाड़ी देशों की सुरक्षा एजेंसियां अक्सर यह आशंका जताती रही हैं कि वहां रहने वाले शिया प्रवासी ईरान की विचारधारा के प्रभाव को फैलाने का माध्यम बन सकते हैं।