व्हाइट हाउस ने बुधवार को कहा कि ईरान के साथ बातचीत 'अच्छी दिशा में आगे बढ़ रही है'। हालांकि, उसने उन सभी खबरों को खारिज कर दिया जिनमें दावा किया गया था कि अमेरिका और ईरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजरानी बहाल करने को लेकर किसी समझौते के करीब पहुंच गए हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कैबिनेट बैठक से पहले व्हाइट हाउस की प्रवक्ता ओलिविया वेल्स ने कहा कि ट्रंप प्रशासन ईरान के साथ बातचीत जारी रखे हुए है। उन्होंने साफ कहा कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर राष्ट्रपति ट्रंप की 'रेड लाइन' पहले से तय है और अमेरिका अपने रुख से पीछे नहीं हटेगा।
ईरानी मीडिया ने किया था दावा
व्हाइट हाउस का यह बयान उस रिपोर्ट के बाद आया जिसमें ईरानी मीडिया ने दावा किया था कि तेहरान और वॉशिंगटन एक मसौदा समझौते के करीब पहुंच चुके हैं। इस समझौते का मकसद पश्चिम एशिया में कई महीनों से जारी सैन्य तनाव को खत्म करना बताया गया था।
रॉयटर्स के मुताबिक, ईरानी सरकारी टीवी ने दावा किया कि ईरान को अमेरिका के समर्थन वाला शुरुआती प्रस्ताव मिला है। इसमें अमेरिका की ओर से ईरान पर लगाए गए नौसैनिक अवरोध हटाने और एक महीने के भीतर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में व्यावसायिक जहाजरानी दोबारा शुरू करने की बात कही गई थी।
ईरानी रिपोर्ट के मुताबिक, अगर अमेरिका खाड़ी क्षेत्र में सैन्य दबाव कम करता और ईरानी बंदरगाहों से आने-जाने वाले जहाजों में दखल देना बंद करता, तो स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में समुद्री यातायात को युद्ध से पहले वाले स्तर पर वापस लाया जा सकता था।
ईरानी सरकारी टीवी ने यह भी दावा किया कि अमेरिका ने ईरान की 'नौसैनिक नाकेबंदी' हटाने और ईरानी जहाजों को परेशान न करने का भरोसा दिया है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि मसौदा समझौते में ईरान के आसपास अमेरिकी सैन्य मौजूदगी घटाने और 60 दिनों तक बातचीत जारी रखने जैसे प्रस्ताव शामिल थे। आगे चलकर यह प्रक्रिया संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के एक बाध्यकारी प्रस्ताव तक पहुंच सकती थी।
अमेरिका ने कहा- ऐसी कोई डील नहीं
हालांकि व्हाइट हाउस ने इन सभी दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया। अमेरिकी अधिकारियों ने साफ कहा कि फिलहाल अमेरिका और ईरान के बीच ऐसा कोई अंतिम समझौता मौजूद नहीं है। व्हाइट हाउस ने इन रिपोर्टों को 'पूरी तरह मनगढ़ंत' बताया।
अब भी तनाव पूरी तरह खत्म नहीं
दोनों देशों के अलग-अलग बयानों से साफ है कि अमेरिका और ईरान के बीच हालात अब भी बेहद नाजुक बने हुए हैं।
28 फरवरी से शुरू हुए संघर्ष के बाद पश्चिम एशिया का बड़ा हिस्सा अस्थिर हो गया था। हालांकि 8 अप्रैल से तकनीकी रूप से युद्धविराम लागू है, लेकिन इसके बावजूद दोनों देश लगातार एक-दूसरे पर समझौते तोड़ने के आरोप लगाते रहे हैं।