इस साल मौसम की बेरुखी ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। दिसंबर और जनवरी जैसे अहम महीनों में बारिश न होने से दलहनी फसलों पर सीधा असर पड़ता दिख रहा है। चना, मसूर और मटर जैसी फसलें आमतौर पर हल्की शीतकालीन वर्षा से नई ऊर्जा पाती हैं, जिससे उनकी बढ़वार और उत्पादन बेहतर होता है। लेकिन इस बार खेतों में नमी की कमी साफ नजर आने लगी है। ऐसे हालात में किसानों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि बिना बारिश फसलों को कैसे बचाया जाए और नुकसान को कैसे रोका जाए। बदलते मौसम के साथ खेती के तौर-तरीकों में भी समझदारी से बदलाव करना जरूरी हो गया है।
अच्छी बात यह है कि कम पानी और कम लागत में भी दलहनी फसलों को सुरक्षित रखने के व्यावहारिक उपाय मौजूद हैं। सही तकनीक और समय पर किए गए प्रयास किसानों को इस मुश्किल दौर से निकाल सकते हैं और फसलों को सूखे की मार से बचाने में मददगार साबित हो सकते हैं।
दलहनी फसलों की नाजुक जरूरत: ज्यादा पानी नहीं, बस नमी
प्रगतिशील युवा किसान रनजोद सिंह बताते हैं कि दलहनी फसलें भारी सिंचाई की मांग नहीं करतीं। इन्हें केवल हल्की और नियंत्रित नमी चाहिए। अधिक पानी देने से जड़ें कमजोर हो सकती हैं और पौधों की सेहत पर उल्टा असर पड़ता है। ऐसे में सही तकनीक से दी गई हल्की फुहारें ही फसलों के लिए सबसे फायदेमंद साबित होती हैं।
मिनी स्प्रिंकलर है तो सोने पर सुहागा
अगर किसान के पास मिनी स्प्रिंकलर सिस्टम उपलब्ध है, तो दलहनी फसलों के लिए यह सबसे बेहतरीन विकल्प है। इसकी बारीक फुहारें सीधे पौधों पर गिरती हैं, जिससे मिट्टी की ऊपरी सतह में नमी बनी रहती है। इससे पौधों को तनाव नहीं झेलना पड़ता और उनकी ग्रोथ स्वाभाविक रूप से जारी रहती है।
स्प्रिंकलर नहीं? ट्रैक्टर स्प्रे पंप बनेगा सहारा
छोटे और सीमांत किसानों के लिए राहत की बात यह है कि मिनी स्प्रिंकलर न होने पर भी घबराने की जरूरत नहीं है। ट्रैक्टर चालित स्प्रे पंप का स्मार्ट इस्तेमाल कर वे वही काम कर सकते हैं। स्प्रे गन से निकलने वाली महीन फुहारें स्प्रिंकलर की तरह ही असर दिखाती हैं। इस देसी तकनीक से चना और मटर जैसी फसलें सूखने से बचती हैं और कम खर्च में अच्छा उत्पादन संभव हो पाता है।
सिंचाई का सही तरीका और सही टाइमिंग
ट्रैक्टर स्प्रे पंप से सिंचाई के लिए पीटीओ संचालित हाई-प्रेशर पंप का उपयोग करें। लंबी पाइप और बारीक नोजल की मदद से पूरे खेत में हल्की फुहार छोड़ी जाती है। चूंकि यह सिंचाई बेहद हल्की होती है, इसलिए इसकी निरंतरता जरूरी है। किसानों को 5–6 दिन के अंतराल पर नियमित छिड़काव करते रहना चाहिए।
इस तकनीक से मिट्टी की ऊपरी परत में नमी बनी रहती है, पौधों को सूखे का झटका नहीं लगता और फूल झड़ने की समस्या भी कम होती है। सबसे बड़ी बात, यह तरीका पानी की बर्बादी रोकते हुए पैदावार बढ़ाने में मदद करता है। सही समय पर सही सिंचाई अपनाकर किसान मौसम की मार से अपनी दलहनी फसलों को सुरक्षित रख सकते हैं।