अरहर की खेती को किसानों के लिए एक भरोसेमंद और मुनाफे वाली फसल माना जाता है, लेकिन इसकी सफलता पूरी तरह सावधानी और सही समय पर देखरेख पर निर्भर करती है। जरा सी चूक किसानों को भारी आर्थिक नुकसान में डाल सकती है। खासतौर पर फली बनने के दौर में अरहर की फसल पर कीट और रोग तेजी से हमला करते हैं, जिससे उत्पादन और गुणवत्ता दोनों प्रभावित होती है। कई बार शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज कर देने से समस्या और गंभीर हो जाती है। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर स्थित ठाकुर छेदीलाल बैरिस्टर कृषि महाविद्यालय के कृषि रोग विशेषज्ञ डॉ. विनोद निर्मलकर का कहना है कि यदि किसान समय रहते फसल की नियमित निगरानी करें और वैज्ञानिक तरीके से दवाओं का उपयोग करें,
तो बड़े नुकसान से आसानी से बचा जा सकता है। सही जानकारी और जागरूकता के साथ किसान न केवल अपनी फसल को सुरक्षित रख सकते हैं, बल्कि बेहतर पैदावार भी हासिल कर सकते हैं।
अरहर की सबसे गंभीर समस्या फल भेदक कीट है। यह कीट फली और पत्तियों के अंदर घुसकर नुकसान करता है, जिससे दाने खराब हो जाते हैं और उत्पादन में भारी गिरावट आती है। किसानों को नियमित निगरानी करते हुए समय पर कीटनाशक दवा का छिड़काव करना चाहिए। फल भेदक नियंत्रण के लिए प्रति एकड़ दो लीटर दवा का छिड़काव प्रभावी रहता है।
फली आने पर बढ़ती है समस्याएं
फली बनने के समय अरहर में विल्ट रोग सबसे अधिक दिखाई देता है। इस रोग में पौधों की पत्तियां सिमट जाती हैं, फूल नहीं आते और पौधा धीरे-धीरे सूखने लगता है। यह रोग सीधे खेत की उपज पर असर डालता है।
कीटनाशक से रोग और कीट पर नियंत्रण
डॉ. निर्मलकर के अनुसार, क्लोरोपायरीफॉस या इमिडाक्लोप्रिड 17.8% एसएल जैसी दवाओं को 5–6 मिली प्रति स्प्रेयर पानी में मिलाकर छिड़काव करने से कीट और रोग दोनों पर प्रभावी नियंत्रण मिलता है।
विल्ट रोग से बचाव के लिए बीज उपचार जरूरी है। बीजों को ट्राइकोडर्मा और स्यूडोमोनास से उपचारित करना चाहिए। साथ ही, खेत की मिट्टी में 2–2.5 क्विंटल सड़ी हुई गोबर खाद मिलाकर छिड़काव करने से मिट्टी के लाभकारी सूक्ष्मजीव बढ़ते हैं और मिट्टी से फैलने वाले रोग कम होते हैं।
लक्षण पहचान कर करें रोग की पुष्टि
किसान अरहर में रोग आसानी से पहचान सकते हैं:
डॉ. निर्मलकर का कहना है कि समय पर इन लक्षणों को पहचानकर सही उपचार करने से अरहर की फसल को बड़े नुकसान से बचाया जा सकता है और बेहतर उत्पादन हासिल किया जा सकता है।