बिहार के ईस्ट चंपारण जिले के संग्रामपुर इलाके में तरबूज की खेती का एक बेहद अनोखा और देसी तरीका देखने को मिलता है। यहां किसान तरबूज, जिसे स्थानीय भाषा में “लालमी” कहा जाता है, को उगाने के लिए आधुनिक मशीनों पर नहीं, बल्कि अपने पारंपरिक अनुभव और जुगाड़ पर भरोसा करते हैं। खास बात यह है कि कड़कड़ाती ठंड में बीजों को अंकुरित करने के लिए किसान उन्हें अपने साथ रजाई-कंबल में रखकर सोते हैं, ताकि शरीर की गर्मी से बीजों को जरूरी ताप मिल सके।
ये तरीका सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन इसी से फसल की शुरुआत होती है। इस अनोखी परंपरा ने संग्रामपुर की खेती को अलग पहचान दी है, जहां मेहनत और देसी समझ मिलकर एक खास तरह की कृषि परंपरा को जीवित रखे हुए हैं।
किसान बली मुखिया लोकल 18 से बात करते हुए बताते हैं कि, तरबूज की खेती दिसंबर से शुरू होती है। बीजों को पहले 24 घंटे पानी में भिगोया जाता है। फिर इन्हें पत्तों में बांधकर किसान अपनी गोद में लेकर रातभर कंबल में रखते हैं। शरीर की गर्मी से बीज जल्दी फूट जाते हैं, वरना कड़ाके की ठंड में वे अंकुरित नहीं हो पाते।
बालू की जमीन पर उगती मीठी फसल
यहां तरबूज उपजाऊ मिट्टी में नहीं, बल्कि नदी किनारे की रेतीली जमीन यानी बालू में उगाया जाता है। बीजों को बराबर दूरी पर लगाया जाता है और ठंड से बचाने के लिए ऊपर घास-फूस ढक दी जाती है। जैसे-जैसे गर्मी बढ़ती है, फसल तेजी से तैयार होने लगती है।
मेहनत और पानी दोनों जरूरी
रेतीली जमीन होने की वजह से पानी जल्दी सूख जाता है, इसलिए हर 3 दिन में सिंचाई जरूरी होती है। यहां काले और पीले तरबूज खास तौर पर अपनी मिठास के लिए मशहूर हैं।
इस खेती में “झिल्ली” नाम की बीमारी बड़ा खतरा है, जो पूरी फसल को बर्बाद कर सकती है। इसका अब तक कोई पक्का इलाज नहीं मिला है, जिससे किसान हमेशा चिंता में रहते हैं।
यह तरबूज की खेती करीब 6 महीने चलती है। जब बाजार में मीठे तरबूज पहुंचते हैं, तो उसके पीछे किसानों की दिन-रात की मेहनत होती है। नुकसान होने पर मुआवजे की कमी से किसान परेशान रहते हैं, लेकिन फिर भी वे हर साल अपनी परंपरा और देसी जुगाड़ से इस अनोखी खेती को जारी रखते हैं।