सौराष्ट्र और पूरे गुजरात में किसान अब प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ रहे हैं और पारंपरिक फसलों के साथ-साथ अमरूद, सीताफल, आम, नारियल जैसी बागवानी फसलें उगा रहे हैं। प्राकृतिक खेती न केवल किसानों के लिए लाभकारी साबित हो रही है, बल्कि ये स्वस्थ जीवन और सस्टेनेबल लाइफस्टाइल की दिशा में भी एक बड़ा कदम है। बागवानी की फसलों की कम देखभाल की जरूरत होती है। इन्हें अन्य फसलों के साथ भी उगाया जा सकता है, जिससे खेत की उपज बढ़ती है और किसान की आय में सुधार होता है। किसानों का कहना है कि प्राकृतिक खेती अपनाने से रासायनिक उर्वरक और दवाओं का उपयोग कम हो जाता है, जिससे मिट्टी और पर्यावरण दोनों सुरक्षित रहते हैं।
ये ट्रेंड केवल खेती तक सीमित नहीं है, बल्कि लोगों में स्वस्थ भोजन और नैचुरल लाइफस्टाइल को बढ़ावा दे रहा है। सौराष्ट्र के कई किसान इस बदलाव से खुश हैं और इसे भविष्य की टिकाऊ जीवनशैली का हिस्सा मानते हैं।
भावनगर जिले के जमवाली-1 गांव के किसान धंधुकिया भरतभाई लोकल 18 से बात करते हुए बताते हैं कि पहले रासायनिक खेती करते थे। 2018 से उन्होंने प्राकृतिक खेती अपनाई और अब वो कई फसलें उगा रहे हैं। पहले वे कपास और मूंगफली उगाते थे, लेकिन सही कीमत न मिलने के कारण उन्होंने 60 अमरूद के पौधे लगाने शुरू किए।
प्राकृतिक खेती से बढ़ी आमदनी
भरतभाई बताते हैं कि अमरूद की खेती में किसी भी रासायनिक उर्वरक या दवा का इस्तेमाल नहीं होता। सिर्फ 10 पत्तियों पर हल्का अर्क छिड़काव किया जाता है। इस तरह तीन वर्षों में 60,000 से अधिक अमरूद का उत्पादन हो चुका है। पूरे उत्पादन से उन्हें लगभग 1,00,000 रुपये की आमदनी की उम्मीद है।
गांव में प्रेरणा की मिसाल
भरतभाई अपने गांव में पहले व्यक्ति थे जिन्होंने अमरूद के पौधे लगाए। वो खेत और घर से सीधे अमरूद बेच रहे हैं, जिससे बाजार के भाव से भी अधिक कीमत उन्हें मिल रही है। उन्होंने कहा कि विभिन्न किसान बैठकों और प्रशिक्षणों में भाग लेने से उन्हें प्राकृतिक खेती अपनाने की प्रेरणा मिली।