हर बार यूनियन बजट से पहले इनहेरिटेंस टैक्स को लेकर चर्चा बढ़ जाती है। कुछ लोगों का मानना है कि सरकार को इनहेरिटेंस टैक्स लगाना चाहिए। लेकिन, ऐसे लोगों की संख्या ज्यादा है, जिनका मानना है कि इनहेरिटेंस नहीं लगाया जाना चाहिए। हाल में ब्रोकरेज फर्म जीरोधा के फाउंडर नितिन कामत ने इस बारे में अपनी राय व्यक्त की है। उन्होंने कहा है कि इंडिया में इनहेरिटेंस टैक्स लगाया जाना चाहिए। इनहेरिटेंस टैक्स का मतलब क्या है, कामत ने इसे लागू करने की सलाह क्यों दी है?
इनहेरिटेंस टैक्स का मतलब क्या है?
जब एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को संपत्ति का ट्रांसफर होता है तो कई देशों में उस पर टैक्स लगता है। इसे इनहेरिटेंस टैक्स (Inheritance Tax) कहा जाता है। कामत ने एक पॉडकास्ट में इस बारे में अपनी राय व्यक्त की। उन्होंने कहा, "मेरा मानना है कि इंडिया जैसे देश में इनहेरिटेंस टैक्स लगाया जाना चाहिए। बगैर रिडिस्ट्रिब्यूशन के संपत्ति के एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के पास जाना ठीक नहीं है।" उन्होंने कहा कि हर बार जब किसी एक पीढ़ी को कुछ अमाउंट ट्रांसफर होता है तो उसे उस पर कुछ टैक्स चुकाना चाहिए।
थॉमस पिकेटी ने भी इनहेरिटेंस टैक्स को जरूरी बताया था
कामत ने हालांकि यह माना कि इंडिया में इनहेरिटेंस टैक्स का लागू करना मुश्किल है। लेकिन, उनका मानना है कि आखिर में वेल्थ के रिडिस्ट्रिब्यूशन के लिए इस तरीके का इस्तेमाल करना पड़ेगा। इससे पहले फ्रांस के इकोनॉमिस्ट थॉमस पिकेटी ने इंडिया में अमीर और गरीब के बीच बढ़ती खाई को देखते हुए वेल्थ और इनहेरिटेंस टैक्स लगाने की वकालत की थी। उन्होंने कहा था कि 10 करोड़ रुपये से ज्यादा की संपत्ति पर सालाना 2 फीसदी वेल्थ टैक्स लगाया जाना चाहिए। इसी तरह 10 करोड़ रुपये से ज्यादा की संपत्ति के ट्रांसफर पर इनहेरिटेंस टैक्स लगाया जाना चाहिए। इससे इंडिया के रेवेन्यू में हर साल जीडीपी के 2.73 फीसदी तक बढ़ जाएगा।
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कामत ने अमीरों को संपत्ति दान करने की सलाह दी
कामत ने अमीर लोगों को स्वेच्छा से अपनी संपत्ति दान करने की सलाह दी। इंडिया में कई ऐसे बड़े कारोबारी हैं, जिन्होंने स्वेच्छा से अपनी काफी संपत्ति दान कर दी है। इनमें विप्रो के अजीम प्रेमजी और एचसीएल टेक्नोलॉजी के शिव नादर के नाम शामिल हैं। इंडिया में संपत्ति के मामले में काफी असामनता है। अमीर और गरीब के बीच की खाई काफी गहरी है। सरकार की कोशिशों के बावजूद आबादी का हिस्सा गरीबी में रहने को मजबूर है। उसे बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं है।