बांग्लादेश के चर्चित हिंदू गायक और राजनीतिक कार्यकर्ता प्रोलॉय चाकी की जेल कस्टडी में मौत ने देश में राजनीतिक तनाव, मानवाधिकार और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर नई बहस को जन्म दे दिया है। अवामी लीग से जुड़े चाकी की रविवार रात जेल में ही मृत्यु हो गई, जिससे उनके परिवार और समर्थकों में गहरी चिंता और आक्रोश फैल गया। प्रशासन का दावा है कि उनकी मौत प्राकृतिक कारणों से हुई, लेकिन परिवार ने जेल में लापरवाही और समय पर मेडिकल इलाज न मिलने का आरोप लगाया है। प्रोलॉय चाकी सिर्फ एक राजनीतिक नेता नहीं थे, बल्कि सांस्कृतिक और संगीत जगत में भी सक्रिय थे और वे दशकों से धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील विचारधारा को बढ़ावा दे रहे थे।
उनकी मौत ऐसे समय में हुई जब बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता, अल्पसंख्यकों पर हमले और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरा बढ़ रहा है, जिससे यह घटना सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सांकेतिक और संवेदनशील बन गई है।
चाकी केवल एक राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं थे, बल्कि सांस्कृतिक और संगीत जगत के जाने-माने चेहरा भी थे। उत्तरी बांग्लादेश में वे अवामी लीग के प्रभावशाली आयोजक माने जाते थे और दशकों से संगीत व सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील विचारधारा को बढ़ावा देते रहे। वे अवामी लीग की पबना जिला इकाई में सांस्कृतिक मामलों के सचिव थे और उनके गीत विशेषकर अल्पसंख्यक समुदायों में बेहद लोकप्रिय थे।
गिरफ्तारी के पीछे का कारण
दिसंबर 2024 में हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान एक धमाके के मामले में पुलिस ने चाकी को गिरफ्तार किया था। हालांकि, परिवार का दावा है कि गिरफ्तारी के वक्त उनके नाम को केस में शामिल तक नहीं किया गया था, फिर भी उन्हें हिरासत में लिया गया। ये कार्रवाई ऐसे समय में हुई जब अवामी लीग से जुड़े कई नेताओं और कार्यकर्ताओं पर बड़े पैमाने पर सरकारी कार्रवाई की जा रही थी।
पबना जेल के सुपरिटेंडेंट मोहम्मद उमर फारुक के अनुसार, चाकी पहले से ही डायबिटीज और दिल की बीमारी से जूझ रहे थे। रविवार रात उन्हें कार्डियक अरेस्ट आया और उन्हें पबना जनरल हॉस्पिटल तथा राजशाही मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल ले जाया गया, जहां उनकी मौत हो गई।
परिवार प्रशासन के दावों को खारिज करता है। उनके बेटे सोनी चाकी का कहना है कि जेल में उनकी तबीयत बिगड़ती रही, लेकिन समय पर इलाज नहीं कराया गया और परिवार को सूचना नहीं दी गई। अस्पताल में भर्ती कराने के लिए भी परिवार को खुद हस्तक्षेप करना पड़ा, तब तक काफी देर हो चुकी थी।
बढ़ते खतरे और राजनीतिक सवाल
चाकी की मौत ऐसे समय में हुई है जब बांग्लादेश में धार्मिक, जातीय अल्पसंख्यक और राजनीतिक विरोधियों पर हमले बढ़े हैं। कई सांस्कृतिक संस्थान, शेख मुजीबुर रहमान से जुड़े स्मारक और राजनयिक मिशन निशाने पर आए। इस पृष्ठभूमि में चाकी की कस्टोडियल डेथ सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं, बल्कि राजनीतिक दमन, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर मंडराते खतरे का प्रतीक बन गई है।