फिल्म 'धुरंधर 2' की सफलता ने जहां रणवीर सिंह को एक्शन सुपरस्टार के रूप में स्थापित किया है, वहीं फिल्म के विलेन 'बड़े साहब' ने भी दर्शकों के दिलों में खौफ पैदा कर दिया है। इस डरावने और प्रभावशाली लुक के पीछे अभिनेता दानिश इकबाल की अविश्वसनीय शारीरिक और मानसिक तपस्या छिपी है। दानिश ने बताया कि कैसे 'बड़े साहब' के रूप में ढलने के लिए उन्हें घंटों तक कुर्सी पर स्थिर बैठना पड़ता था।
9 घंटे का मेकअप और सांस लेने में तकलीफ
दानिश इकबाल ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि अगर उनकी शूटिंग सुबह 7 बजे शुरू होनी होती थी, तो उन्हें रात 3 बजे ही सेट पर पहुंचना पड़ता था। उन्होंने कहा, "लगभग पांच से छह लोग मिलकर मुझ पर 9 घंटे तक प्रोस्थेटिक मेकअप करते थे। यह प्रक्रिया न केवल थका देने वाली थी, बल्कि शारीरिक रूप से दर्दनाक भी थी। मेकअप के बाद आप ठीक से सांस नहीं ले सकते, आपको अंदर ही अंदर पसीना आता है और ऐसा महसूस होता है जैसे आप किसी पिंजरे में कैद हैं।"
मेकअप इतना जटिल और नाजुक था कि एक बार लग जाने के बाद दानिश कुछ भी खा नहीं सकते थे। उन्होंने खुलासा किया, "पूरे दिन मैं केवल तरल पदार्थों (Liquids) पर निर्भर रहता था। मैं थोड़ा जूस पीता था और ऊर्जा बनाए रखने के लिए कभी-कभी डार्क चॉकलेट का एक छोटा टुकड़ा ले लेता था।" यह अनुशासन बनाए रखना किसी चुनौती से कम नहीं था, खासकर तब जब आपको सेट पर घंटों तक भारी डायलॉग्स और सीन देने हों।
थकान को ही बना लिया अपनी ताकत
हैरान करने वाली बात यह है कि दानिश ने इस असहनीय थकान और बेचैनी को अपने अभिनय के खिलाफ नहीं, बल्कि उसके पक्ष में इस्तेमाल किया। उन्होंने बताया, "9 घंटे के मेकअप के बाद आप वैसे ही पूरी तरह टूट चुके होते हैं। मैंने अपनी उस थकान और कमजोरी को 'बड़े साहब' के किरदार में ढाल दिया। इससे मेरा प्रदर्शन और भी वास्तविक लगने लगा।"
किरदार की बारीकियों को समझने के लिए दानिश इकबाल ने कई बुजुर्गों और शारीरिक चुनौतियों का सामना कर रहे लोगों के व्यवहार का बारीकी से अध्ययन किया, ताकि पर्दे पर उनकी सत्ता और कमजोरी का संतुलन सटीक दिखे।
रणवीर सिंह के साथ पुराना नाता
दानिश ने इस फिल्म के जरिए अभिनेता रणवीर सिंह के साथ अपने पुराने थिएटर के दिनों को भी याद किया। उन्होंने बताया कि रणवीर आज भी उसी ऊर्जा से भरे हुए हैं जैसी उनके संघर्ष के दिनों में थी। आदित्य धर के निर्देशन में बनी यह फिल्म दिखाती है कि एक बेहतरीन सिनेमा बनाने के लिए कलाकारों को अपनी सुख-सुविधाओं का कितना बड़ा बलिदान देना पड़ता है।