भारतीय सिनेमा की सुपरहिट फिल्म 'ओम शांति ओम' में शाहरुख खान के पिता का यादगार किरदार निभाने वाले दिग्गज पाकिस्तानी अभिनेता जावेद शेख इन दिनों विवादों के घेरे में हैं। सालों तक बॉलीवुड में सम्मान और काम पाने वाले जावेद शेख को अब उनके अपने ही देश के एक नए धारावाहिक 'जहन्नुम बा-रास्ता जन्नत' के लिए सोशल मीडिया पर कड़ी आलोचना और ट्रोलिंग का सामना करना पड़ रहा है।
क्या है विवाद की मुख्य वजह?
सोशल मीडिया पर इस शो के कुछ वीडियो क्लिप्स तेजी से वायरल हो रहे हैं, जिन्हें देखकर भारतीय और पाकिस्तानी दोनों ही दर्शक हैरान हैं। इस धारावाहिक में जावेद शेख 'प्रीतम जयपाल' नामक एक नकारात्मक भूमिका निभा रहे हैं। दर्शकों का आरोप है कि उनका यह किरदार और पूरा अभिनय स्टाइल बॉलीवुड की हालिया ब्लॉकबस्टर फिल्म 'धुरंधर' में आर. माधवन द्वारा निभाए गए 'अजय सान्याल' के किरदार की हूबहू नकल है।
'प्रोपेगेंडा' और भारत के खिलाफ जहर उगलने का आरोप
केवल अभिनय की नकल ही नहीं, बल्कि शो की कहानी को लेकर भी तीखी प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। धारावाहिक में 'रॉ' (RAW) और 'ऑपरेशन सिंदूर' जैसे संदर्भों का इस्तेमाल किया गया है, जो सीधे तौर पर भारत विरोधी नैरेटिव की ओर इशारा करते हैं।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म रेडिट और ट्विटर पर यूजर्स ने अपना गुस्सा जाहिर करते हुए कहा कि जावेद शेख ने दशकों तक बॉलीवुड से नाम और पैसा कमाया, लेकिन अब वे ऐसे 'प्रोपेगेंडा' आधारित शो का हिस्सा बन रहे हैं जो दोनों देशों के बीच नफरत फैलाने का काम करते हैं। एक यूजर ने लिखा, "यह देखना दुखद है कि एक टैलेंटेड एक्टर अपनी विरासत को इस तरह के घटिया प्रोडक्शन के लिए दांव पर लगा रहा है।"
प्रोडक्शन क्वालिटी पर भी उठे सवाल
फिल्म 'धुरंधर' अपनी बेहतरीन सिनेमैटोग्राफी और इंटेलिजेंस ऑपरेशंस के सटीक चित्रण के लिए जानी जाती है, लेकिन जावेद शेख के इस सीरियल की तुलना में लोग इसके प्रोडक्शन और निर्देशन को बेहद कमजोर बता रहे हैं। वायरल वीडियो में दिखाए गए दृश्यों और संवादों को दर्शकों ने 'हास्यास्पद' बताया है। लोगों का कहना है कि यह शो केवल 'धुरंधर' की लोकप्रियता को भुनाने की एक असफल कोशिश है।
विरासत और वर्तमान का टकराव
जावेद शेख न केवल पाकिस्तान बल्कि भारत में भी एक प्रतिष्ठित चेहरा रहे हैं। 'नमस्ते लंदन' और 'ओम शांति ओम' जैसी फिल्मों ने उन्हें घर-घर में पहचान दिलाई। लेकिन इस ताजा विवाद ने उनके करियर के इस पड़ाव पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। मानवीय दृष्टिकोण से देखें तो एक कलाकार के लिए काम का चुनाव उसका निजी फैसला हो सकता है, लेकिन जब बात दो देशों के संवेदनशील रिश्तों और 'नकल' की आती है, तो जनता की अदालत में सफाई देना मुश्किल हो जाता है।