Sandeep Reddy Vanga का 'धुरंधर' विवाद पर तीखा पलटवार, "यह काला चश्मा उतारिए, प्रोपेगेंडा नहीं सिनेमा है"

Sandeep Reddy Vanga: फिल्म निर्देशक संदीप रेड्डी वांगा ने फिल्म 'धुरंधर' को 'प्रोपेगेंडा' कहने वालों को करारा जवाब देते हुए इसे आलोचकों की 'काली दृष्टि' बताया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि साहसी सिनेमा को एजेंडा कहना गलत है और नई सोच के लिए पुरानी रूढ़ियों के 'खेत को जलाना' जरूरी है।

अपडेटेड Apr 09, 2026 पर 10:08 PM

भारतीय सिनेमा में अपनी फिल्मों के साथ-साथ अपने बेबाक बयानों के लिए मशहूर निर्देशक संदीप रेड्डी वांगा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। इस बार वजह उनकी अपनी कोई फिल्म नहीं, बल्कि रणवीर सिंह स्टारर ब्लॉकबस्टर फिल्म 'धुरंधर: द रिवेंज' है। फिल्म को मिल रही अपार सफलता के बीच कुछ आलोचकों ने इसे 'प्रोपेगेंडा' करार दिया है, जिस पर वांगा ने अपने ही अंदाज में कड़ा जवाब दिया है।

"मुट्ठी भर लाल मिर्च" और "काला चश्मा"

एक हालिया इंटरव्यू में जब वांगा से फिल्म पर लग रहे प्रोपेगेंडा के टैग के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने इसे 'काली दृष्टि' का नाम दिया। वांगा ने कहा, "जब कोई फिल्म समाज के कड़वे सच या किसी विशेष विचारधारा को साहस के साथ दिखाती है, तो उसे प्रोपेगेंडा कहना आसान हो जाता है। यह कुछ ऐसा ही है जैसे किसी की आंखों में मुट्ठी भर लाल मिर्च झोंक दी गई हो और उन्हें सच दिखाई न दे रहा हो।"

उन्होंने आगे कहा कि कुछ लोग 'काला चश्मा' पहनकर सिनेमा देखते हैं और उन्हें हर चीज में एजेंडा नजर आता है। वांगा के अनुसार, सिनेमा को उसके शिल्प और कहानी कहने के तरीके से आंका जाना चाहिए, न कि उसे राजनीतिक चश्मे से देखा जाना चाहिए।


"खेत जलाना पड़ेगा": वांगा का सख्त तेवर

संदीप रेड्डी वांगा यहीं नहीं रुके। उन्होंने एक मेटाफर (रूपक) का इस्तेमाल करते हुए कहा कि अगर नई सोच की फसल उगानी है, तो पुरानी और सड़ी-गली सोच के 'खेत को जलाना पड़ेगा'। उनके इस बयान को फिल्म इंडस्ट्री के उन पुराने मानदंडों पर हमले के रूप में देखा जा रहा है जो अक्सर साहसी सिनेमा को दबाने की कोशिश करते हैं। उनका मानना है कि 'धुरंधर' जैसी फिल्में भारतीय सिनेमा के लिए एक नई राह खोल रही हैं।

'धुरंधर' की सफलता और विवाद का संगम

जहां एक तरफ फिल्म बॉक्स ऑफिस पर 1600 करोड़ रुपये से अधिक की कमाई कर चुकी है, वहीं दूसरी ओर इसके कथानक (plot) को लेकर सोशल मीडिया पर दो फाड़ देखने को मिल रहे हैं। वांगा का समर्थन फिल्म के निर्देशक आदित्य धर के लिए एक बड़ी ताकत बनकर उभरा है।

वांगा का यह बयान फिर से वही पुरानी बहस छेड़ देता है कि कला को कितना स्वतंत्र होना चाहिए। जहां आलोचक इसे समाज के लिए 'जहरीला' या 'एकतरफा' बताते हैं, वहीं वांगा जैसे फिल्मकार इसे अभिव्यक्ति की आजादी मानते हैं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि वांगा के इस 'तीखे' जवाब के बाद इंडस्ट्री के अन्य दिग्गज क्या प्रतिक्रिया देते हैं।

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