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Sanjay Dutt: संजय दत्त के ट्रांसफॉर्मेशन ने उड़ाए होश, 'आखिरी सवाल' और 'खलनायक रिटर्न्स' में दिखा बिल्कुल अलग अंदाज़

Sanjay Dutt: संजय दत्त के पास फिल्मों की लाइन लगी हुई है। एक्टर की कई फिल्में रिलीज होने वाली हैं। खास बात ये है कि हर फिल्म में उनका अलग अंदाज देखने को मिलेगा।

Moneycontrol Hindi Newsअपडेटेड Apr 25, 2026 पर 1:31 PM
Sanjay Dutt: संजय दत्त के ट्रांसफॉर्मेशन ने उड़ाए होश, 'आखिरी सवाल' और 'खलनायक रिटर्न्स' में दिखा बिल्कुल अलग अंदाज़
संजय दत्त इन दिनों लाइम लाइट में छाए हुए हैं। एक्टर का 'आखिरी सवाल' और 'खलनायक रिटर्न्स' में ट्रांसफॉर्मेशन हर किसी को चौंका रहा है।

Sanjay Dutt: संजय दत्त स्टारर 'आखिरी सवाल' बहुत ही कम समय में सबसे ज्यादा इंतज़ार की जाने वाली फिल्मों में से एक बनकर उभरी है, और हाल ही में आए इसके टीज़र ने इस उत्साह को और भी बढ़ा दिया है। एक दिलचस्प और सोचने पर मजबूर कर देने वाली झलक दिखाते हुए, यह फिल्म सच्ची घटनाओं से प्रेरित लगती है, जो कुछ सबसे ज्यादा बहस वाले और विवादित विषयों की गहराई में जाती है। इसके केंद्र में संजय दत्त का किरदार है-गंभीर, रौबदार और सत्ता से सवाल करने में निडर, जो उन्हें एक जटिल दुनिया में जवाब तलाशने वाले व्यक्ति के रूप में पेश करता है। उनका लुक और उनके प्रदर्शन का शांत आत्मविश्वास अभी से चर्चा का मुख्य विषय बन गया है।

​दिलचस्प बात यह है कि चर्चा यहीं खत्म नहीं होती। उनकी एक और आने वाली फिल्म 'खलनायक रिटर्न्स' में उनके लुक ने भी सबका ध्यान खींचा है, जहां वह एक रफ-टफ और खूंखार अवतार में वापसी कर रहे हैं, जो उनकी आइकॉनिक मास अपील को दर्शाता है। जहां 'आखिरी सवाल' पेसेंश और आंतरिक संघर्ष पर आधारित है, वहीं 'खलनायक रिटर्न्स' अपनी ऊर्जा और दमदार मौजूदगी पर टिकी है।

​साथ में, ये दोनों फिल्में न केवल अलग-अलग लुक्स को दिखाती हैं, बल्कि संजय दत्त की आर्ट निखर का बाहर आ रही हैं, जो यह बताती हैं कि वे कितनी आसानी से बिल्कुल अलग किरदारों के बीच तालमेल बिठा लेते हैं। यह एक अभिनेता के तौर पर उनकी गजब की वर्सटाइल प्रतिभा को फिर से साबित करता है।

​'आखिरी सवाल' भारत के अतीत के कुछ महत्वपूर्ण पड़ावों की पड़ताल करती है, जिनमें आरएसएस (RSS) पर प्रतिबंध, बाबरी मस्जिद विध्वंस और महात्मा गांधी की हत्या शामिल है। एक अलग नजरिया पेश करते हुए, यह फिल्म दुनिया के सबसे बड़े स्वैच्छिक संगठनों में से एक के विकास को दर्शाती है और स्थापित कहानियों पर सवाल उठाती है। यह साहसी इरादे के साथ संवेदनशील ऐतिहासिक घटनाओं को दोबारा याद करती है। अपने टीज़र और पोस्टर्स से पहले ही बहस छेड़ चुकी यह फिल्म दर्शकों को सोचने पर मजबूर करने और इतिहास के एक ऐसे अध्याय में ले जाने का वादा करती है जिसे बहुत कम टटोला गया है।

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