रिटायर्ड आर्मी ऑफिसर की भूमिका में अनिल कपूर ने दर्शकों के दिलों पर फिर से राज किया है। अमेजन प्राइम वीडियो पर 5 मार्च 2026 को रिलीज हुई फिल्म 'सूबेदार' में उनका गुस्सा, दर्द और ताकत भरा अभिनय स्क्रीन को हिला देता है। निर्देशक सुरेश त्रिवेणी की यह एक्शन ड्रामा एक पिता की भावुक यात्रा दिखाती है, जो रिटायरमेंट के बाद छोटे शहर की गुंडागर्दी से टकराता है। लेकिन शानदार परफॉर्मेंस के बावजूद कमजोर स्क्रिप्ट ने फिल्म को पूरा न्याय नहीं दिया। अनिल के साथ अदित्य रावल ने खलनायक के रोल में जान फूंक दी, जो दर्शकों को बांधे रखती है।
अनिल कपूर का अविस्मरणीय अभिनय
69 साल की उम्र में अनिल कपूर ने अर्जुन मौर्या का किरदार इतनी गहराई से निभाया कि लगता है वे खुद फौजी हैं। पत्नी की सड़क हादसे में मौत का दर्द, बेटी से दूरी का पछतावा – हर सीन में उनकी आंखें बोलती हैं। एक्शन सीक्वेंस में उनका स्टाइल 80s के मसाला हीरोज को याद दिलाता है। एक सीन में जब वे गुंडों से भिड़ते हैं, तो दर्शक तालियां बजाने को मजबूर हो जाते हैं। राधिका मदान ने बेटी श्यामा का रोल सशक्तीकरण के साथ निभाया, जो पिता से अपनी राह खुद चुनने की जिद दिखाती है।
अदित्य रावल ने प्रिंस भैया के किरदार में आग लगा दी। यह अस्थिर, अहंकारी गुंडा मिर्ज़ापुर के मुनने से अलग लगता है, लेकिन उतना ही खतरनाक है। मोना सिंह ने जेल से माफिया चलाने वाली बबली दीदी का रोल किया, जो फिल्म का ट्विस्ट लाती हैं। सौरभ शुक्ला दोस्त प्रभाकर के रूप में हंसी और वफादारी का तड़का लगाते हैं। फसील मलिक का सॉफ्टी भी मजेदार है। लेकिन कास्ट के बावजूद, कहानी दोहरावदार हो जाती है।
हालांकि, फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी पटकथा और कहानी का बिखराव है। कई जगह कहानी पुरानी और क्लिशे लगती है, जिससे दर्शकों का जुड़ाव टूट जाता है। विलेन का किरदार भी उतना प्रभावी नहीं है, जिससे टकराव का असर कम हो जाता है। दर्शक एक्शन और भावनाओं के बीच संतुलन की उम्मीद करते हैं, लेकिन फिल्म उस स्तर तक नहीं पहुंच पाती।
निर्देशक सुरेश त्रिवेणी ने फिल्म को एक्शन और ड्रामा का मिश्रण बनाने की कोशिश की है। विजुअल्स और सिनेमैटोग्राफी अच्छी है, लेकिन कमजोर स्क्रिप्ट के कारण फिल्म का असर फीका पड़ जाता है।
फिल्म छोटे शहर के रेत माफिया की दुनिया को दिखाती है, जहां सिस्टम फेल है। पहला हाफ टेंशन बनाता है, लेकिन क्लाइमेक्स खिंच जाता है। अर्जुन के पुराने फौजी दोस्तों का आना थोड़ा फॉर्मूला लगता है। बैकग्राउंड म्यूजिक और लोकेशन्स ने माहौल बनाया। यह देशभक्ति, परिवार और न्याय की कहानी है, जो मनोरंजन देती है लेकिन गहराई कम है।