अभिजीत दिपके ने लॉन्च किया 'क्या बोलती पब्लिक' अभियान, कहा- शिक्षा कमाई का जरिया नहीं

Abhijeet Dipke: कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके ने गुरुवार को 'क्या बोलती पब्लिक' नाम से देशभर में एक जन-संपर्क अभियान शुरू किया है। उन्होंने कहा कि इस पहल का मकसद नागरिकों से सीधे जुड़ना और उनकी परेशानियों व मुद्दों को करीब से समझना है।

अपडेटेड Aug 06, 2026 पर 4:38 PM
अभिजीत दिपके ने लॉन्च किया 'क्या बोलती पब्लिक' अभियान

Abhijeet Dipke: कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके ने गुरुवार को 'क्या बोलती पब्लिक' नाम से देशभर में एक जन-संपर्क अभियान शुरू किया है। उन्होंने कहा कि इस पहल का मकसद नागरिकों से सीधे जुड़ना और उनकी परेशानियों व मुद्दों को करीब से समझना है। इस दौरान दिपके ने स्कूल-कॉलेजों में बढ़ती फीस को लेकर भी चिंता जताई।

अभियान की शुरुआत की घोषणा करते हुए दिपके ने कहा कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार इस अभियान की पहली प्राथमिकता होगी। उन्होंने तर्क दिया कि स्कूल, कॉलेज और कोचिंग की बढ़ती फीस के कारण आम परिवारों के लिए अच्छी शिक्षा पाना मुश्किल होता जा रहा है।

शिक्षा में सुधार पहला मुद्दा होगा


उन्होंने कहा कि "शिक्षा में सुधार हमारा पहला मुद्दा होगा जिस पर हम काम करेंगे। दिपके ने कहा, हमारा मानना ​​है कि देश में शिक्षा महंगी हो गई है। पहली कक्षा के लिए सालाना फीस 1 लाख से 2 लाख रुपये के बीच है, और इसके अलावा डोनेशन भी देना पड़ता है।"

मध्यम और कम आय वाले परिवारों के लिए इतनी महंगी शिक्षा का खर्च उठाना कितना मुश्किल है, इस पर सवाल उठाते हुए दिपके ने कहा कि कई परिवार अपने बच्चों की पढ़ाई का खर्च जुटाने के लिए काफी संघर्ष कर रहे हैं।

उन्होंने कहा, “जिन परिवारों की आमदनी इतनी नहीं है, वे इतना पैसा कहां से लाएंगे?”

माता-पिता कर्ज लेने को मजबूर

दिपके ने यह भी दावा किया कि कॉलेजों और कोचिंग संस्थानों की बढ़ती फीस के कारण कई माता-पिता अपने बच्चों की शिक्षा का खर्च उठाने के लिए कर्ज लेने को मजबूर हो रहे हैं।

उन्होंने कहा, “कॉलेज और कोचिंग की फीस भी लगातार बढ़ती जा रही है, जिसकी वजह से कई परिवारों पर कर्ज का बोझ बढ़ रहा है। हम परिवारों को इस बोझ से मुक्त करना चाहते हैं। अगर माता-पिता अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाना चाहते हैं, तो उन पर बोझ नहीं पड़ना चाहिए।”

दिपके ने अंबेडकर का किया जिक्र

डॉ. बी.आर. अंबेडकर का जिक्र करते हुए, दिपके ने तर्क दिया कि शिक्षा को एक व्यावसायिक गतिविधि के बजाय एक मौलिक अधिकार बने रहना चाहिए।

उन्होंने कहा, "डॉ. बी.आर. अंबेडकर के अनुसार यह एक मौलिक अधिकार है, लेकिन पिछले कुछ सालों में यह मुनाफा कमाने का एक व्यापार बन गया है।"

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