AI Supremacy Race: भारत इस समय वैश्विक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की दौड़ में अमेरिका और चीन के बाद सबसे बड़े खिलाड़ी के रूप में उभर रहा है। वॉल स्ट्रीट जर्नल (WSJ) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत की 100 करोड़ से अधिक डिजिटल-साक्षर आबादी अमेरिकी टेक कंपनियों के लिए दुनिया का सबसे 'हॉट मार्केट' बन गई है। भारत की यह बढ़त केवल आबादी तक सीमित नहीं है, बल्कि केंद्र सरकार द्वारा बजट में घोषित 20 साल के टैक्स हॉलिडे ने विदेशी निवेश के लिए रेड कार्पेट बिछा दिया है। आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव का मानना है कि यह नीति भारत को एक प्रमुख ग्लोबल एआई हब बनने का ऐतिहासिक अवसर देगी, जहां दुनिया भर की डेटा सेवाओं का संचालन यहीं से होगा।
माइक्रोसॉफ्ट, अमेजॉन और गूगल ने किया अरबों डॉलर का निवेश
एआई के क्षेत्र में अपना दबदबा बनाने के लिए अमेरिकी 'हाइपरस्केलर्स' भारत में पानी की तरह पैसा बहा रहे हैं। माइक्रोसॉफ्ट ने पिछले साल भारत में $17.5 बिलियन के निवेश की घोषणा की, जबकि उसकी प्रतिद्वंद्वी कंपनी अमेजॉन ने एआई और रोजगार सृजन के लिए $35 बिलियन का बड़ा चेक काटा है। इसी कड़ी में गूगल ने दक्षिण-पूर्वी भारत में डेटा केंद्रों और अंडरसी केबल लिंक के लिए $15 बिलियन का निवेश करते हुए इसे 'अमेरिका के बाहर अपना सबसे बड़ा एआई हब' घोषित किया है। ये कंपनियां केवल बुनियादी ढांचा ही नहीं बना रही हैं, बल्कि भारत की विशाल डेटा खपत को भुनाने की तैयारी में हैं, क्योंकि भारत में प्रति स्मार्टफोन मोबाइल डेटा की खपत दुनिया में सबसे अधिक है।
डेटा स्थानीयकरण और भारतीय यूजर्स का एआई प्रेम
भारत की ओर इस खिंचाव के पीछे दो मुख्य कारण हैं- पहला, भारत के नए डेटा-प्राइवेसी नियम जो कंपनियों को भारतीय यूजर्स का डेटा स्थानीय स्तर पर स्टोर करने के लिए मजबूर करते हैं। दूसरा, भारतीयों के बीच जेनरेटिव एआई (Gen-AI) को अपनाने की गजब की रफ्तार। बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप के अनुसार, 62% भारतीय एआई टूल्स का उपयोग कर रहे हैं, जो ब्राजील के बाद दुनिया में दूसरी सबसे ऊंची दर है। हालांकि भारत दुनिया का 20% डेटा पैदा करता है, लेकिन वर्तमान में इसका केवल 3% ही भारत में स्टोर होता है। यही वह अंतर है जिसे भरने के लिए दुनिया भर की डेटा सेंटर कंपनियां भारत की ओर दौड़ रही हैं।
टैक्स क्लैरिटी के साथ 'चाइना+1' रणनीति का मिल रहा फायदा
पहले भारत में वैश्विक राजस्व पर टैक्स के नियमों को लेकर अनिश्चितता थी, जिससे कंपनियां बड़े पैमाने पर विस्तार करने से कतराती थीं। कानून विशेषज्ञों का मानना है कि नई टैक्स नीति ने इस डर को खत्म कर दिया है, जिससे कंपनियां अब भारत को केवल एक बाजार नहीं बल्कि एक 'ग्लोबल सर्विस हब' के रूप में देख रही हैं। साथ ही, वैश्विक स्तर पर चल रही 'चाइना+1' रणनीति के तहत मल्टीनेशनल कंपनियां चीन के विकल्प के रूप में भारत को प्राथमिकता दे रही हैं। भारत के पास अंग्रेजी बोलने वाला वर्कफोर्स, इंजीनियरों का विशाल पूल और सहायक सरकारी योजनाएं हैं, जो इसे एआई अनुसंधान के बजाय इसके व्यावहारिक और कम लागत वाले अनुप्रयोगों के लिए दुनिया का सबसे पसंदीदा केंद्र बनाती हैं।