अंडमान बेसिन में मिले गैस के भंडार से देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए बढ़ी उम्मीदें, लेकिन कमर्शियल सप्लाई में अभी भी लगेंगे कई साल

Andaman Basin Natural Gas: भारत अपनी जरूरत का 85% तेल और 50% गैस आयात करता है। ईरान युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के कारण भारत की ऊर्जा सप्लाई पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है। ऐसे में अंडमान सागर एक बड़ा गेम-चेंजर साबित हो सकता है

अपडेटेड Mar 30, 2026 पर 4:04 PM
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एक अनुमान के मुताबिक, अंडमान बेसिन में 371 मिलियन टन तेल और गैस का भंडार हो सकता है

Andaman Basin: बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक तेल आपूर्ति में बाधाओं के बीच भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए अब गहरे समुद्र और नए क्षेत्रों की ओर रुख कर रहा है। इस पूरी रणनीति के केंद्र में अंडमान-निकोबार बेसिन है, जहां गैस के बड़े भंडार मिलने के संकेत मिले हैं। हालांकि, जानकारों का कहना है कि इस गैस का इस्तेमाल हमारे घरों या उद्योगों में होने में अभी लंबा वक्त लगेगा।

अंडमान-निकोबार बेसिन ही क्यों है खास?

भारत अपनी जरूरत का 85% तेल और 50% गैस आयात करता है। ईरान युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के कारण भारत की ऊर्जा सप्लाई पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है। ऐसे में अंडमान सागर एक बड़ा गेम-चेंजर साबित हो सकता है। एक अनुमान के मुताबिक, इस बेसिन में 371 मिलियन टन तेल और गैस का भंडार हो सकता है।


सरकार ने 'ओपन एकरेज लाइसेंसिंग पॉलिसी' (OALP) के तहत करीब 10 लाख वर्ग किलोमीटर के उन इलाकों को खोज के लिए खोल दिया है, जहां पहले पाबंदी थी। सरकारी कंपनी ONGC और Oil India साल 2026 की शुरुआत से ही यहां ड्रिलिंग और सर्वे के काम में जुटी हैं।

कहां मिली गैस और कहां रही नाकामी?

अंडमान सागर में चल रही ड्रिलिंग से अब तक मिले-जुले परिणाम सामने आए हैं:

विजयापुरम-1: यह कुआं 'ड्राई' रहा, यानी यहां कुछ नहीं मिला।

विजयापुरम-2: यहां 2,212 से 2,250 मीटर की गहराई पर गैस की मौजूदगी की पुष्टि हुई है, जिसमें 87 प्रतिशत मीथेन पाई गई है।

अल्ट्रा-डीपवाटर ड्रिलिंग: ONGC यहां 6,000 मीटर गहराई तक ड्रिलिंग करने की योजना पर काम कर रही है। हालांकि गैस के संकेत मिले हैं, लेकिन अभी तक 'कमर्शियल सफलता' नहीं मिली है।

2030 के बाद ही गैस का प्रोडक्शन संभव

भले ही गैस मिल गई है, लेकिन इसे मुख्य भूमि तक पहुंचाना एक बड़ी चुनौती है। एक गहरे समुद्री प्रोजेक्ट को खोज से लेकर उत्पादन तक पहुंचने में 6 से 10 साल का समय लगता है। इसमें कई चरणों की मंजूरी, रिजर्व का मूल्यांकन और बुनियादी ढांचा तैयार करना शामिल है। अंडमान में फिलहाल कोई पाइपलाइन या गैस प्रोसेसिंग प्लांट नहीं है। जानकारों का मानना है कि सबसे अच्छी स्थिति में भी यहां से कमर्शियल उत्पादन 2030 के दशक की शुरुआत या मध्य से पहले मुमकिन नहीं है।

क्या है शॉर्ट-टर्म समाधान?

जब तक नए बेसिन तैयार नहीं होते, तब तक भारत को अपनी तत्कालीन जरूरतों के लिए मौजूदा संपत्तियों पर ध्यान देना होगा। मुंबई हाई, बाड़मेर और असम जैसे पुराने क्षेत्रों में 'एन्हांस्ड ऑयल रिकवरी' (EOR) तकनीक का इस्तेमाल कर उत्पादन गिरने से रोकना होगा। साथ ही महानदी और कावेरी बेसिन के साथ-साथ कोयला खदानों से निकलने वाली गैस पर भी फोकस करना होगा।

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