Anukampa Niyukti: अनुकंपा नौकरी में बड़े बेटे को मिलेगी पहले प्राथमिकता, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

Compassionate Jobs: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि यदि मृत सरकारी कर्मचारी के एक से अधिक बच्चे अनुकंपा नियुक्ति के योग्य हैं, तो वरिष्ठता के आधार पर बड़े बच्चे को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। कोर्ट ने निर्देश दिया कि पात्रता की जांच के बाद बड़े बेटे के दावे पर 30 दिनों के भीतर विचार किया जाए

अपडेटेड Aug 17, 2026 पर 10:21 AM
Compassionate Jobs: हाई कोर्ट के फैसले के अनुसार अनुकंपा नौकरी में बड़े बेटे को मिलेगी प्राथमिकता

Compassionate Jobs: अनुकंपा नियुक्ति को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जिस पर नए सिरे से चर्चा शुरू हो गई है। कोर्ट ने कहा कि अगर किसी मृत सरकारी कर्मचारी के एक से अधिक पात्र बच्चे अनुकंपा नियुक्ति का दावा करते हैं, तो बड़े बच्चे को उसकी वरिष्ठता के आधार पर प्राथमिकता दी जानी चाहिए। हाईकोर्ट ने मुंगेली जिले के एक मामले में छोटे बेटे को दी गई अनुकंपा नियुक्ति का आदेश रद्द करते हुए मामला जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) को वापस भेज दिया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि पात्रता की जांच के बाद बड़े बेटे के दावे पर 30 दिनों के भीतर विचार किया जाए।

मुंगेली के सरकारी स्कूल में चपरासी के पद पर कार्यरत ईश्वर सिंह क्षत्रिय की सितंबर 2016 में मृत्यु हो गई थी। उनकी दो पत्नियां थीं। पहली पत्नी के बेटे जितेंद्र सिंह क्षत्रिय (35 वर्ष) और दूसरी पत्नी के बेटे राजकुमार दोनों ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया था। 7 अगस्त 2019 को मुंगेली के जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) ने छोटे बेटे राजकुमार को नौकरी दे दी। इसके खिलाफ बड़े बेटे जितेंद्र ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

अदालत का फैसला


जस्टिस संजय के. अग्रवाल की पीठ ने DEO के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि हालांकि दूसरी पत्नी से जन्मा बच्चा भी कानूनी वारिस होता है। लेकिन जब कई भाई-बहनों में से चुनाव करना हो तो वरिष्ठता (उम्र में बड़े होने) के नियम का पालन होना चाहिए। अदालत ने DEO को 30 दिनों के भीतर बड़े बेटे की पात्रता की जांच कर उसके दावे पर विचार करने का निर्देश दिया है।

दोनों बेटों ने किया था दावा

मामला मुंगेली के एक सरकारी उच्चतर माध्यमिक विद्यालय से जुड़ा है। वहां पदस्थ ईश्वर सिंह क्षत्रिय की 29 सितंबर 2016 को मृत्यु हो गई थी। उनके दो विवाह हुए थे। पहली पत्नी से उनका बेटा जितेंद्र सिंह क्षत्रिय और दूसरी पत्नी से बेटा राजकुमार था। पिता की मृत्यु के बाद दोनों बेटों ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया। हालांकि, जिला शिक्षा अधिकारी ने 7 अगस्त 2019 को राजकुमार को नौकरी देने का फैसला किया। इस फैसले को जितेंद्र ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस संजय के. अग्रवाल ने 8 अगस्त के आदेश में मुंगेली DEO के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें छोटे बेटे राजकुमार को अनुकंपा नियुक्ति दी गई थी। कोर्ट ने कहा कि जब एक से अधिक पात्र संतान अनुकंपा नियुक्ति का दावा करती हैं, तो उम्र और वरिष्ठता के आधार पर बड़े बच्चे के दावे को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल बड़ा होना ही पर्याप्त नहीं है। बड़े बेटे को नियुक्ति के लिए निर्धारित सभी पात्रता शर्तों को पूरा करना होगा। इसी कारण मामला दोबारा DEO के पास भेजा गया है।

शादीशुदा होना अनुकंपा नियुक्ति के रास्ते में बाधा नहीं

मामले में यह भी महत्वपूर्ण सवाल उठा कि क्या शादीशुदा संतान अनुकंपा नियुक्ति का लाभ ले सकती है। कोर्ट ने कहा कि विवाह अपने आप में आश्रित संतान को अनुकंपा नियुक्ति के लाभ से बाहर करने का आधार नहीं हो सकता। कोर्ट ने इस संबंध में पूर्व में दिए गए पटना हाईकोर्ट और झारखंड हाईकोर्ट के फैसलों का भी उल्लेख किया। अदालत ने माना कि यदि अन्य पात्रता शर्तें पूरी होती हैं तो केवल वैवाहिक स्थिति के आधार पर दावा खारिज नहीं किया जा सकता।

सरकार को बड़े बेटे के दावे की जांच करनी होगी

हाईकोर्ट ने मामले को जिला शिक्षा अधिकारी के पास वापस भेजते हुए निर्देश दिया कि जितेंद्र के दावे की पात्रता की जांच की जाए और उसके बाद 30 दिनों के भीतर उचित निर्णय लिया जाए। इस फैसले से उन मामलों में महत्वपूर्ण दिशा मिलती है, जहां मृत सरकारी कर्मचारी के एक से अधिक बच्चे अनुकंपा नियुक्ति के लिए पात्र होते हैं। कोर्ट के मुताबिक ऐसे मामलों में केवल विभाग की पसंद या किसी एक संतान को नियुक्ति देना पर्याप्त नहीं है। बल्कि पात्रता, वरिष्ठता और प्रशासनिक नियमों को ध्यान में रखकर फैसला किया जाना चाहिए।

वरिष्ठता अकेले सरकारी पद पर हक नहीं देती

इसी मामले से जुड़े एक अन्य फैसले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सिर्फ वरिष्ठता के आधार पर किसी सरकारी कर्मचारी को ऊंचे पद पर नियुक्ति या प्रभार पाने का स्वतः अधिकार नहीं मिल जाता। एक ब्लॉक शिक्षा अधिकारी (BEO) ने जूनियर सहकर्मी को प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी बनाए जाने को चुनौती दी थी।

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कोर्ट ने राज्य सरकार के फैसले को बरकरार रखा। पीठ ने कहा कि किसी अधिकारी को अस्थायी रूप से उच्च पद का प्रभार देना एक प्रशासनिक व्यवस्था है। इसमें प्रशासनिक उपयुक्तता और अधिकारी के पूरे रिकॉर्ड को भी देखा जा सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि वरिष्ठता महत्वपूर्ण कारक हो सकती है, लेकिन वह अकेले किसी अधिकारी को उच्च पद का स्वतः अधिकार नहीं देती।

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