बिहार की राजधानी पटना के गांधी मैदान में आज हजारों लोगों ने एक साथ ईद की नमाज अदा की, लेकिन इस बार बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए। इस दौरान जदयू नेता और सीएम के बेटे निशांत कुमार नमाजियों के बीच पहुंचे और लोगों से मुलाकात की। उनकी गैरमौजूदगी इसलिए भी चर्चा में रही, क्योंकि वे अब तक हर साल इस आयोजन में हिस्सा लेते रहे हैं। इस बार उन्होंने मैदान में जाने की बजाय अन्य कार्यक्रमों और एक संदेश के जरिए ईद की शुभकामनाएं दीं। अपने संदेश में उन्होंने राज्य और देश के लोगों, खासकर मुस्लिम समुदाय को ईद की बधाई देते हुए शांति, खुशहाली और समृद्धि की कामना की।
निशांत कुमार ने संभाली कमान
इस बार पटना के गांधी मैदान में ईद के मौके पर एक बड़ा बदलाव देखने को मिला, जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जगह उनके बेटे निशांत कुमार ने कार्यक्रम में हिस्सा लिया। हाल ही में जेडीयू में शामिल हुए निशांत ने वहां लोगों से मुलाकात की और अपने पिता की ओर से ईद की शुभकामनाएं दीं। उन्होंने मीडिया से बात करते हुए बिहार और देशवासियों को ईद की बधाई दी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, मंत्री अशोक चौधरी के साथ पहुंचे निशांत का वहां मौजूद लोगों ने जोरदार स्वागत किया और उनके आसपास मुख्यमंत्री जैसी सुरक्षा व्यवस्था भी देखने को मिली, जिससे उनकी मौजूदगी को खास माना गया।
यह पूरा मामला बिहार की बदलती राजनीति के बीच सामने आया है। आरजेडी और कांग्रेस से अलग होने के बाद 2022 से नीतीश कुमार का बीजेपी के साथ गठबंधन है, जिससे मुस्लिम नेताओं के एक वर्ग में नाराजगी बढ़ी है। स्थिति तब और चर्चा में आई जब जेडीयू ने वक्फ संशोधन बिल 2024 का समर्थन किया, जिसके बाद पार्टी के कई मुस्लिम नेताओं ने इस्तीफा दे दिया। ऐसे में मुख्यमंत्री का गांधी मैदान के कार्यक्रम में न जाना और उनकी जगह बेटे निशांत कुमार को भेजना, राजनीतिक हलकों में एक बड़े बदलाव के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
रिपोर्ट के मुताबिक, पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का मानना है कि गांधी मैदान में निशांत कुमार की मौजूदगी सिर्फ औपचारिक नहीं, बल्कि एक सोच-समझकर उठाया गया कदम है। इसे मुस्लिम समुदाय के बीच भरोसा दोबारा बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि नीतीश कुमार भविष्य में अपने बेटे को पार्टी में बड़ी जिम्मेदारी देने की तैयारी कर रहे हैं, ताकि वह उनकी परंपरा को आगे बढ़ा सके। साथ ही, इस कदम को नीतीश कुमार के राष्ट्रीय राजनीति की ओर बढ़ने की संभावनाओं से भी जोड़कर देखा जा रहा है, जहां वह आगे चलकर राज्यसभा के जरिए सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं।