रील्स का शोर, बनारस की गलियां और टूटती विरासत के बीच रखी बिस्मिल्लाह खां की शहनाई

कभी अलग लय में चलने वाली काशी...अब रीलबाजों के बीच फंसी हुई नजर आती है। घाटों पर अब सुकून की जगह बस भीड़ ही भीड़ दिखती है। खैर रील की दुनिया से निकालकर आपको इस जिंदादिल शहर के एक ऐसी गली में ले चलते हैं, जहां दरकते दिवारों के बीच रखी है एक पुरानी सी शहनाई और उसी दिवार पर लिखा है 'भारत रत्न बिस्मिल्लाह खां

अपडेटेड Mar 21, 2026 पर 2:11 PM
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बिस्मिल्लाह खा, बाला साहब ठाकरे के साथ

ये दुनिया जब से शुरू हुई है तब से इसका हर दशक...किसी ना किसी घटना या कुछ महान लोगों से पहचाना जाता रहा है। पर जिस दशक में हम और आप जी रहे हैं उसे शायद रील और कॉन्टेंट के झरोखे से देखा जाएगा। और ये झरोखा एक अंधे कुएं जैसा ही है...जिसमें अंधकार और पानी की जगह सच और झूठ ने ले रखा हो। फिलहाल भारत की सबसे पुरानी धार्मिक और सांस्कृतिक नगरी वाराणसी भी इसी झरोखे से देखी जा रही है। अभी यहां जाने पर ऐसा लगता है मानो शहर के हर गली-कूचे में कैमरे लगे हैं, जो हर समय वारयल होने के लिए आपमें कॉन्टेंट की तलाश कर रहे हों। कभी अलग लय में चलने वाली काशी...अब रीलबाजों के बीच फंसी हुई नजर आती है। घाटों पर अब सुकून की जगह बस भीड़ ही भीड़ दिखती है। खैर रील की दुनिया से निकालकर आपको इस जिंदादिल शहर के एक ऐसी गली में ले चलते हैं, जहां दरकते दिवारों के बीच रखी है एक पुरानी सी शहनाई और उसी दिवार पर लिखा है 'भारत रत्न बिस्मिल्लाह खां'

बनारस के दालमंडी का इलाका बनारस के दालमंडी का इलाका

बनारस के हराय सराय की गलियों के आसपास इन दिनों आपको, बाजार का शोर कम और बुल्डोजर की आवाज ज्यादा सुनाई देगी। टूटते-बिखरते मलबों के बीच साइकिल पर चाकू की धार तेज करने वाले भी लय में काम करते दिख जाएंगे। वहीं इस गली के कोने में आपको एक पुरानी सी हवेली दिखेगी, जिसका लेटर बॉक्स उसकी अलगी पहचान को बताता है...जिसपर लिखा है 'भारत रत्न बिस्मिल्लाह खां' यह सोचकर हैरानी होती है कि उस्ताद बिस्मिल्लाह खान जैसा कलाकार ने इतनी साधारण और शोर-शराबे वाली जगह में रहकर अपने संगीत को ऊंचाई तक पहुंचाया। लेकिन अफसोस की बात यह है कि उनके अपने शहर में ही उनकी विरासत को वह सम्मान और देखभाल नहीं मिल पा रही, जिसकी वह हकदार है।


बिस्मिल्लाह खां के घर पर रखी उनकी एक तस्वीर बिस्मिल्लाह खां के घर पर रखी उनकी एक तस्वीर

बिस्मिल्लाह खां... शहनाई के ऐसे फनकार, जिनकी सांसें भी सुरों में डूबी लगती थीं। शहनाई को मंदिरों की चारदीवारी से निकाल अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाने का श्रेय भी उस्ताद बिस्मिल्ला खां को ही जाता है। उनकी साधना का आलम ऐसा था कि जब वो शहनाई बजाते तो सुनने वाले रूहानी सफर पर निकल जाते। बिस्मिल्ला खां हमेशा कहते थे कि मेरे लिए शहनाई इबादत है। वह इकलौते कलाकार थे, जिन्हें भारत के चारों सर्वोच्च नागरिक सम्मान (पद्म श्री, पद्म भूषण, पद्म विभूषण और भारत रत्न) से नवाजा गया।

बिस्मिल्लाह खां का सितार बिस्मिल्लाह खां का सितार

बिस्मिल्लाह खां की बेटी जरीना बेगम आज भी उसी घर में रहती है, जहां शहनाई के इस जादूगर ने अपनी जिंदगी बिताई। पिता को याद कर वो बताती हैं कि, 'हमारे आपके नजर में तो वो शिया थें, मुसलमान थे पर अल्लाह ने नजर में वो क्या था अल्लाह ही जाने। हर रोज खाना खाने से पहले वो भोग निकालते थे...पर कभी किसी को बताते नहीं थे कि ये क्या है।' पिता से जुड़ा एक किस्सा वो सुनाती हैं कि, 'एक बार कमरे में बंद होकर वो रियाज कर रहे थे। रियाज करते-करते रात के करीब दो बज गए। तभी उनके पास अचानक से भिनी-भिनी खूश्बू आने लगी और जब आंख खोलकर उन्होंने देखा तो सामने कोई बुजुर्ग से आदमी खड़ा था। उस बुजुर्ग ने बस उनसे इतना कहा, 'डर मत बच्चा तू मजा करेगा'...इतना कहते ही मानो वो बुजुर्ग अचानक गायब सा हो गया।

परिवार ने बिस्मिल्लाह खां से जुड़े सामान को काफी सहेज कर एक कमरे में रखा है। उस कमरे आप जब दाखिल होंगे तो दीवार पर एक काफी खास तस्वीर देखने को मिली। तस्वीर में बिस्मिल्लाह खा, बाला साहब ठाकरे के साथ नजर आते हैं। इस तस्वीर को लेकर जरीना बताती हैं कि, 'बाला साहब, उन्हें अपने भाई की तरह मानते थे और ये तस्वीर उनके घर की है।' बिस्मिल्लाह खां ने बाला साहब ठाकरे को भी अपना मुरीद बना लिया था। जब पहली बार बाला साहब ठाकरे से मुलाकात हुई तो उन्होंने उस्ताद से शहनाई की धुन में बधैया को सुनने की इच्छा जाहिर की थी, इसके बाद खान ने लगभग 40 मिनट तक शहनाई बजाई थी। शहनाई की धुन सुनने के बाद बाला साहब उनकी इस कला के मुरीद बन बैठे थे।

बिस्मिल्लाह खा, बाला साहब ठाकरे के साथ बिस्मिल्लाह खा, बाला साहब ठाकरे के साथ

कुछ सालों पर एक खबर सामने आई थी कि बिस्मिल्लाह खान के एक पोते ने उनकी चार शहनाइयों को बनारस में दो सुनारों को मात्र 17 हजार रुपये में बेच दिया। ये शहनाइयां चांदी की बनी थी। यह सुनकर भले ही दुख हो, लेकिन हैरानी कम ही होती है, क्योंकि लंबे समय तक उनके बड़े परिवार का गुजारा उनकी कला पर ही चलता रहा। अब जब उस्ताद हमारे बीच नहीं हैं, तो उनके पीछे बची थोड़ी-बहुत धरोहर भी धीरे-धीरे खत्म होती नजर आ रही है।

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