ये दुनिया जब से शुरू हुई है तब से इसका हर दशक...किसी ना किसी घटना या कुछ महान लोगों से पहचाना जाता रहा है। पर जिस दशक में हम और आप जी रहे हैं उसे शायद रील और कॉन्टेंट के झरोखे से देखा जाएगा। और ये झरोखा एक अंधे कुएं जैसा ही है...जिसमें अंधकार और पानी की जगह सच और झूठ ने ले रखा हो। फिलहाल भारत की सबसे पुरानी धार्मिक और सांस्कृतिक नगरी वाराणसी भी इसी झरोखे से देखी जा रही है। अभी यहां जाने पर ऐसा लगता है मानो शहर के हर गली-कूचे में कैमरे लगे हैं, जो हर समय वारयल होने के लिए आपमें कॉन्टेंट की तलाश कर रहे हों। कभी अलग लय में चलने वाली काशी...अब रीलबाजों के बीच फंसी हुई नजर आती है। घाटों पर अब सुकून की जगह बस भीड़ ही भीड़ दिखती है। खैर रील की दुनिया से निकालकर आपको इस जिंदादिल शहर के एक ऐसी गली में ले चलते हैं, जहां दरकते दिवारों के बीच रखी है एक पुरानी सी शहनाई और उसी दिवार पर लिखा है 'भारत रत्न बिस्मिल्लाह खां'
