मानसून सत्र खत्म हुए 15 दिन से ज्यादा हो चुके हैं। सत्र के आखिरी दिन, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने उत्तराखंड में बीजेपी सरकार पर जोरदार हमला किया। उन्होंने आरोप लगाया कि हल्द्वानी में उनकी रैली के बाद राज्य की बीजेपी यूनिट ने 'शुद्धिकरण' या सफाई का कार्यक्रम किया था। खड़गे का आरोप था कि यह कार्यक्रम इसलिए किया गया क्योंकि वह दलित हैं।
इसके बाद कांग्रेस इस मुद्दे पर लगभग चुप ही रही, हालांकि सोनिया गांधी, खड़गे के साथ राज्यसभा चेयरमैन से मिलने गईं और इस घटना की औपचारिक शिकायत की।
कुछ दिनों बाद, कांग्रेस वर्किंग कमेटी (CWC) की बैठक में खड़गे ने कथित तौर पर कहा कि उनकी अपनी पार्टी के ज्यादातर नेताओं ने इस मुद्दे को उठाने की जहमत नहीं उठाई। हालांकि, इस बात के एक हफ्ते बाद राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की और तब से कांग्रेस इस मुद्दे पर तेजी से काम कर रही है।
लेकिन कांग्रेस की रणनीति सिर्फ खड़गे का समर्थन करने तक ही सीमित नहीं है। पार्टी की नजर आने वाले उत्तर प्रदेश और पंजाब चुनावों पर है, और उससे भी ज्यादा अहम, 2029 के लोकसभा चुनावों पर है।
बता दें कि भारत की आबादी में दलितों की हिस्सेदारी लगभग 16 प्रतिशत है। उत्तर प्रदेश में यह हिस्सा करीब 20 प्रतिशत है, जबकि पंजाब में अनुसूचित जाति की आबादी लगभग 32 प्रतिशत है।
2024 के लोकसभा चुनावों में "संविधान खतरे में है" वाला नैरेटिव काम आया
राहुल गांधी का मानना है कि 2024 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस का "संविधान खतरे में है" वाला नैरेटिव काम कर गया था। इस नारे ने पार्टी और उसके सहयोगियों को दलित वोटों का एक हिस्सा एकजुट करने में मदद की और बीजेपी को साधारण बहुमत से दूर रखने में भूमिका निभाई।
अब कांग्रेस उत्तराखंड की घटना को एक बड़े राजनीतिक नैरेटिव—खासकर "दलित खतरे में हैं"—में बदलकर उसी रणनीति को दोहराने की कोशिश कर सकती है। यह रणनीति आगामी विधानसभा चुनावों और अंततः 2029 के लोकसभा चुनावों के लिए हो सकती है।
हालांकि, कांग्रेस के सामने एक बड़ी चुनौती भी है। दलित वोट पर कई राजनीतिक दलों की नजर है। BSP अभी भी एक अहम खिलाड़ी है। वहीं, चंद्रशेखर आजाद की पार्टी भी दलित राजनीति में अपनी जगह मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
बीजेपी के पास भी अपना एक जवाबी नैरेटिव है। उनकी कोशिशों में इस बात पर जोर दिया जाता है कि दलितों को सिर्फ वोट बैंक के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए और केंद्र सरकार की योजनाओं का फायदा सीधे उन तक पहुंच रहा है।
पंजाब का उदाहरण कांग्रेस के लिए एक सबक भी है। 2022 के विधानसभा चुनावों में दलित नेता चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाने के बावजूद, कांग्रेस को जीत नहीं मिल सकी।
ऐसे में कांग्रेस के लिए "दलित खतरे में हैं" एक बहुत असरदार राजनीतिक नारा साबित हो सकता है। बता दें कि खड़गे ही वह मुख्य चेहरा हैं जिनके इर्द-गिर्द यह नैरेटिव तैयार किया जा रहा है। हालांकि, इसका बड़ा मकसद दलित वोटों को एकजुट करना है—पहले उत्तर प्रदेश, फिर पंजाब, और फिर 2029 के चुनावों को ध्यान में रखते हुए।