भारत इस साल मौसम की बड़ी चुनौती का सामना करने जा रहा है। प्रशांत महासागर में अल-नीनो की स्थिति तेजी से विकसित हो रही है और यह साल के अंत तक बनी रह सकती है। इस बार अलनीनो के प्रभाव के चलते सामान्य से कम बारिश होने की संभावना है। ऐसे में इस बार ज्यादा पानी चाहने वाली फसलों पर प्रभाव पड़ सकता है. पानी की कमी से उत्पादन पर भी काफी असर पड़ सकता है। ऐसे में देश में सूखे जैसे हालात भी बन सकते हैं। वहीं मंगलवार को कृषि आयुक्त पी.के. सिंह ने कहा कि भारत ने मानसून में देरी या संभावित सूखे की स्थिति से निपटने के लिए पहले से ही तैयारी कर ली है। इसके तहत जिला स्तर पर विशेष आपातकालीन योजनाएं बनाई गई हैं और देश में पर्याप्त मात्रा में अनाज का भंडार भी मौजूद है।
फलसों पर क्या पड़ेगा असर?
फसलों पर मानसून के असर को लेकर पी.के. सिंह ने बताया कि मौसम विभाग से मिले आंकड़ों और पूर्वानुमानों के आधार पर हर जिले के लिए अलग-अलग आकस्मिक योजनाएं तैयार की गई हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य कम बारिश या सूखे जैसी परिस्थितियों में किसानों और खेती को नुकसान से बचाना है। उन्होंने कहा कि जहां और जब बारिश की स्थिति के अनुसार जरूरत महसूस होगी, वहां इन योजनाओं को तुरंत लागू किया जाएगा। सरकार लगातार मौसम की स्थिति पर नजर बनाए हुए है और जरूरत पड़ने पर समय रहते जरूरी कदम उठाएगी।
कृषि आयुक्त पी.के. सिंह ने बताया कि मौजूदा मौसम की स्थिति काफी हद तक वर्ष 2015 के अल नीनो जैसी दिखाई दे रही है। हालांकि, उन्होंने कहा कि पिछले 10 वर्षों में देश के सिंचाई ढांचे में काफी सुधार हुआ है, जिससे अब हालात पहले की तुलना में बेहतर हैं। उन्होंने कहा कि सरकार ने संभावित चुनौतियों से निपटने के लिए पर्याप्त तैयारी कर रखी है। देश में अनाज का भंडार सुरक्षित और मजबूत स्थिति में है। खासकर चावल और गेहूं का स्टॉक पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है, जिससे खाद्य सुरक्षा को लेकर किसी तरह की चिंता नहीं है।
पी.के. सिंह ने भरोसा दिलाया कि यदि किसी कारण से किसी खाद्यान्न की कमी होती है, तो सरकार उसे पूरा करने के लिए जरूरी कदम उठाएगी। जरूरत पड़ने पर विदेशों से आयात भी किया जाएगा, ताकि आम लोगों पर किसी तरह का असर न पड़े। उन्होंने कहा कि सरकार लगातार हालात पर नजर बनाए हुए है और किसानों के हितों के साथ-साथ देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह तैयार है।
40% कम बारिश और अल नीनो का डबल अटैक!
कृषि आयुक्त पी.के. सिंह ने कहा कि जब मानसून में देरी होती है या सूखे जैसी स्थिति बनती है, तो किसान आमतौर पर दालों की खेती की ओर रुख करते हैं। इसकी वजह यह है कि दालों की फसलों को कम पानी की जरूरत होती है और ये कम समय में तैयार हो जाती हैं। उन्होंने बताया कि ऐसे हालात में किसान उन फसलों को प्राथमिकता देते हैं, जिनकी खेती कम लागत और कम पानी में हो सकती है। इससे मौसम की अनिश्चितता का असर खेती पर कुछ हद तक कम हो जाता है। पी.के. सिंह ने कहा कि मौजूदा समय में बारिश सामान्य से करीब 40 प्रतिशत कम दर्ज की गई है। इसके बावजूद किसानों का दालों जैसी कम पानी वाली फसलों की ओर बढ़ता रुझान एक सकारात्मक संकेत है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार लगातार मौसम की स्थिति पर नजर रख रही है और जरूरत पड़ने पर किसानों को हर संभव सहायता उपलब्ध कराई जाएगी, ताकि फसल उत्पादन पर ज्यादा असर न पड़े।
मुंबई पहुंचा दक्षिण-पश्चिम मानसून
भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने बताया कि 23 जून को दक्षिण-पश्चिम मानसून ने और रफ्तार पकड़ी और कई नए इलाकों तक पहुंच गया। इसके तहत मध्य अरब सागर के बाकी हिस्से, महाराष्ट्र के कुछ और क्षेत्र, जिनमें मुंबई भी शामिल है, तेलंगाना और ओडिशा के शेष भाग तथा छत्तीसगढ़, झारखंड और बिहार के कुछ इलाकों में मानसून पहुंच गया है। मौसम विभाग के अनुसार, अगले 2 से 3 दिनों के दौरान मानसून के उत्तर अरब सागर और गुजरात के कुछ हिस्सों में आगे बढ़ने के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनी हुई हैं। इसके अलावा महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के कुछ और क्षेत्रों में भी मानसून के आगे बढ़ने की संभावना है। आईएमडी ने यह भी कहा है कि अगले 3 से 4 दिनों में झारखंड और बिहार के बाकी हिस्सों के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में भी मानसून पहुंच सकता है।