होर्मुज संकट के बीच पीएम मोदी का फॉर्मूला, 1973 की गलती दोहराने से कैसे बचा भारत?
एक ओर पूर्व पीएम इंदिरा गांधी का रुख राजनीतिक और वैचारिक समर्थन पर आधारित था, जबकि दूसरी ओर नरेंद्र मोदी की सरकार ने रणनीतिक और व्यावहारिक नीति को प्राथमिकता दी है। आज भारत अपने राष्ट्रीय हितों, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक संबंधों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता है। योम किप्पुर युद्ध अक्टूबर 1973 में शुरू हुआ था। उस समय मिस्र और सीरिया ने अचानक इजरायल पर हमला कर दिया था
MoneyControl News
अपडेटेड Jun 23, 2026 पर 7:58 PM
1973 से 2025 तक: इंदिरा गांधी और पीएम मोदी की पश्चिम एशिया नीति में क्या है सबसे बड़ा फर्क?
अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर होने के बाद अब दुनिया का ध्यान लड़ाई से हटकर उसके बड़े असर पर केंद्रित हो गया है। भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते आने वाले तेल की सप्लाई को लेकर है। अगर इस अहम समुद्री मार्ग में कोई रुकावट आती है तो इसका असर भारत समेत कई देशों की ऊर्जा जरूरतों पर पड़ सकता है। इस स्थिति ने एक बार फिर यह चर्चा शुरू कर दी है कि भारत ने पिछले कई दशकों में पश्चिम एशिया के बड़े संकटों से कैसे निपटा है। 1973 के योम किप्पुर युद्ध के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का रवैया और हाल के इज़राइल-ईरान तनाव पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रतिक्रिया, भारत की विदेश नीति के दो अलग-अलग दृष्टिकोणों को दिखाती है।
एक ओर पूर्व पीएम इंदिरा गांधी का रुख राजनीतिक और वैचारिक समर्थन पर आधारित था, जबकि दूसरी ओर नरेंद्र मोदी की सरकार ने रणनीतिक और व्यावहारिक नीति को प्राथमिकता दी है। आज भारत अपने राष्ट्रीय हितों, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक संबंधों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता है। योम किप्पुर युद्ध अक्टूबर 1973 में शुरू हुआ था। उस समय मिस्र और सीरिया ने अचानक इजरायल पर हमला कर दिया था। इसके बाद यह संघर्ष तेजी से एक बड़े अंतरराष्ट्रीय संकट में बदल गया। इस टकराव में अमेरिका, सोवियत संघ और अरब देशों के प्रमुख तेल उत्पादक राष्ट्र भी शामिल हो गए थे, जिससे पूरी दुनिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई थी।
पूर्व पीएम इंदिरा गांधी का रुख
1973 के युद्ध के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने खुलकर अरब देशों का समर्थन किया था। भारत ने इस संघर्ष के लिए इज़रायल को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि उसकी सख्त और अड़ियल नीतियां ही क्षेत्र में तनाव और दुश्मनी की मुख्य वजह हैं। भारत ने अरब देशों और फिलिस्तीन के मुद्दे का मजबूती से समर्थन किया। उस समय भारत की विदेश नीति भी काफी हद तक इसी दिशा में थी। हालांकि, राजनीतिक और कूटनीतिक समर्थन देने के बावजूद भारत को इसका कोई खास आर्थिक फायदा नहीं मिला।
युद्ध के बाद दुनिया तेल संकट की चपेट में आ गई। कई अरब देशों ने तेल उत्पादन और आपूर्ति को लेकर सख्त कदम उठाए, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ गईं। रिपोर्टों के मुताबिक, कच्चे तेल का दाम करीब 3 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर लगभग 12 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। तेल की कीमतों में इस भारी बढ़ोतरी का असर भारत पर भी पड़ा। देश को तेल आयात करने के लिए पहले के मुकाबले कई गुना ज्यादा खर्च करना पड़ा, जिससे अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ बढ़ गया।
हालांकि युद्ध खत्म होने के बाद भी भारत का फिलिस्तीन के प्रति समर्थन जारी रहा। वर्ष 1974 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र में फिलिस्तीन मुक्ति संगठन (पीएलओ) को पर्यवेक्षक का दर्जा दिलाने की कोशिश का समर्थन किया। इसके एक साल बाद भारत पीएलओ को आधिकारिक मान्यता देने वाला पहला गैर-अरब देश बन गया। भारत ने नई दिल्ली में पीएलओ का कार्यालय खोलने की भी अनुमति दी। इसके अलावा, भारत ने संयुक्त राष्ट्र के उस प्रस्ताव का भी समर्थन किया था, जिसमें ज़ायोनीवाद को नस्लवाद के समान बताया गया था।
इन फैसलों से साफ होता है कि उस समय भारत के अरब देशों और फिलिस्तीन के साथ काफी करीबी संबंध थे। भारत का मानना था कि इस क्षेत्र के साथ मजबूत राजनीतिक रिश्ते उसके रणनीतिक और आर्थिक हितों को भी फायदा पहुंचाएंगे। उस दौर में भारत की मध्य पूर्व के तेल पर निर्भरता लगातार बढ़ रही थी। ऐसे में सरकार को उम्मीद थी कि अरब देशों के साथ अच्छे संबंध देश की ऊर्जा सुरक्षा और अन्य महत्वपूर्ण जरूरतों को पूरा करने में मदद करेंगे।
मोदी सरकार का रुख
योम किप्पुर युद्ध के लगभग 50 साल बाद पश्चिम एशिया में एक और बड़ा तनाव देखने को मिला। इज़राइल और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष ने दुनिया भर की चिंताओं को फिर से बढ़ा दिया। खास तौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर चिंता बढ़ी, जो दुनिया में तेल आपूर्ति का एक बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग माना जाता है। अगर इस रास्ते में किसी तरह की रुकावट आती है, तो इसका असर पूरी दुनिया के तेल कारोबार पर पड़ सकता है। भारत के लिए यह चिंता और भी बड़ी है, क्योंकि देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात किए गए तेल से पूरा करता है।
दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातक देशों में शामिल भारत के लिए इस तरह का तनाव आर्थिक जोखिम पैदा कर सकता है। खाड़ी क्षेत्र में लंबे समय तक संकट रहने पर तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं, आयात पर खर्च बढ़ सकता है और महंगाई में तेजी आ सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर तेल की आपूर्ति प्रभावित होती है, तो इसका असर केवल ईंधन तक सीमित नहीं रहेगा। परिवहन, उद्योग और रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़ी कई चीजों की कीमतें भी बढ़ सकती हैं। इससे देश की आर्थिक विकास दर पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है।
हालांकि, 1973 के मुकाबले इस बार भारत का रुख काफी अलग रहा। इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव को भारत ने किसी राजनीतिक पक्ष के नजरिए से नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों, ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक स्वतंत्रता के आधार पर देखा। भारत ने किसी एक देश का खुलकर समर्थन करने के बजाय शांति, बातचीत और तनाव कम करने पर जोर दिया। मोदी सरकार लगातार यह कहती रही कि सभी पक्ष बातचीत के जरिए समाधान निकालें और क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखें।
नई दिल्ली ने इज़रायल, ईरान और खाड़ी देशों समेत पश्चिम एशिया के सभी प्रमुख देशों के साथ अपने संबंध बनाए रखे। भारत ने किसी एक खेमे में शामिल होने के बजाय संतुलित नीति अपनाई, ताकि हर परिस्थिति में उसके राष्ट्रीय हित सुरक्षित रहें। इस सोच को अक्सर "भारत पहले" नीति कहा जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि चाहे क्षेत्रीय संघर्ष किसी भी दिशा में जाए, भारत की ऊर्जा जरूरतें, आर्थिक हित और कूटनीतिक संबंध प्रभावित न हों।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का रुख इस पूरे संकट के दौरान व्यावहारिक और स्पष्ट रहा। भारत ने हालात बिगड़ने का इंतजार करने के बजाय पहले से ही जरूरी कदम उठाने शुरू कर दिए। केंद्र सरकार ने कच्चे तेल की आपूर्ति के लिए नए और अलग-अलग स्रोतों पर ध्यान दिया, ताकि किसी एक क्षेत्र पर ज्यादा निर्भरता न रहे। साथ ही, तेल भंडार को मजबूत करने और रिफाइनरियों का काम लगातार जारी रखने पर भी जोर दिया गया, जिससे देश में ईंधन की आपूर्ति प्रभावित न हो।
भारत ने यह भी सुनिश्चित किया कि ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार पर किसी तरह का असर कम से कम पड़े। इसके लिए सरकार ने क्षेत्र के सभी प्रमुख देशों के साथ लगातार संपर्क बनाए रखा। इसके अलावा, पश्चिम एशिया में रहने और काम करने वाले भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को भी प्राथमिकता दी गई। भारत ने संघर्ष में शामिल सभी पक्षों के साथ अपने कूटनीतिक और व्यापारिक संबंध बनाए रखे, ताकि जरूरत पड़ने पर भारतीयों की मदद की जा सके और देश के आर्थिक हित सुरक्षित रहें। इस तरह भारत ने किसी एक पक्ष का समर्थन करने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों, ऊर्जा सुरक्षा और नागरिकों की सुरक्षा को सबसे अधिक महत्व दिया।