Crude Supplies: अमेरिका और ईरान के बीच 14 दिनों के संघर्ष विराम के ऐलान के बाद भारत सहित वैश्विक ऊर्जा बाजार ने राहत की सांस ली है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस दौरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में फंसी हुई तेल की खेप निकलने का रास्ता साफ होगा, हालांकि पूरी तरह सामान्य स्थिति बहाल होने में जुलाई तक का समय लग सकता है।
2-3 हफ्तों में बहाल होगी कच्चे तेल की आपूर्ति
रेटिंग एजेंसी ICRA और कमोडिटी फर्म Kpler के अनुसार, भारत के लिए कच्चे तेल की सप्लाई अगले दो से तीन हफ्तों में काफी हद तक सुधर सकती है। फिलहाल होर्मुज की जलसंधि में लगभग 13.2 करोड़ बैरल कच्चा तेल फंसा हुआ है। शुरुआती दौर में नौसेना की सुरक्षा में बड़े टैंकरों को निकाला जाएगा। जुलाई तक टैंकरों की आवाजाही पूरी तरह सामान्य होने की उम्मीद है। कई तेल क्षेत्रों में उत्पादन बंद है, जिसे दोबारा शुरू करने और बुनियादी ढांचे की मरम्मत में समय लगेगा।
LNG और गैस संकट से रिकवरी में लगेगा वक्त
तेल के मुकाबले LNG की आपूर्ति बहाल होना ज्यादा चुनौतीपूर्ण है। भारत अपनी जरूरत की 45% LNG कतर से मंगाता है। ईरान द्वारा कतर के 'रास लफान' इंडस्ट्रियल सिटी पर किए गए हमलों से गैस संयंत्रों को नुकसान पहुंचा है। विशेषज्ञों का कहना है कि गैस उत्पादन सुविधाओं को दोबारा शुरू करने में ही कम से कम दो हफ्ते लगेंगे। पूरी क्षमता बहाल होने में कई महीने लग सकते हैं।
LPG की सप्लाई में बाधा है भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता
भारत अपनी जरूरत की 60% रसोई गैस (LPG) खाड़ी देशों कतर, यूएई, सऊदी अरब और कुवैत से आयात करता है। भारत के कुल LPG आयात का 90% हिस्सा इसी तनावग्रस्त 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' से होकर आता है। रिफाइनरियों को हुए नुकसान के कारण LPG की उपलब्धता और उसकी मात्रा को लेकर अभी भी अनिश्चितता बनी हुई है।
बीमा और इंफ्रास्ट्रक्चर की चुनौतियां
भले ही युद्ध विराम हो गया है, लेकिन शिपिंग उद्योग के लिए मुश्किलें कम नहीं हुई हैं। अगर 14 दिन बाद दोबारा संघर्ष शुरू होता है, तो जहाजों का इंश्योरेंस प्रीमियम आसमान छू सकता है। तेल और गैस संयंत्रों की मरम्मत के लिए दुनिया में बहुत कम तकनीकी विशेषज्ञ उपलब्ध हैं, जिससे काम धीमा हो सकता है।
होर्मुज है भारत की 'एनर्जी लाइफलाइन'
पश्चिम एशिया में महीने भर से जारी इस संघर्ष ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा को खतरे में डाल दिया था। भारत के 50% तेल इंपोर्ट के लिए यह रास्ता बेहद महत्वपूर्ण है। विश्लेषकों का मानना है कि ईरान भी भारत और चीन जैसे अपने बड़े ग्राहकों के साथ व्यापारिक संबंध बचाए रखना चाहता है, इसलिए वह इस समुद्री रास्ते को खोलने के लिए इच्छुक होगा।