Rare Earth Magnets : सेमीकंडक्टर या चिप की तरह ही आधुनिक उद्योग के लिए अति महत्वपूर्ण आइटम रेयर अर्थ मैग्नेट पर अब सिर्फ चीन का दबदबा नहीं रहेगा। अगले एक साल में चीन के साथ भारत भी रेयर अर्थ मैग्नेट का बड़ा उत्पादक के साथ वैश्विक सप्लायर बनने जा रहा है। जानकारी के मुताबिक, भारत रेयर अर्थ मैग्नेट बनाने के लिए अपने इंसेंटिव प्रोग्राम को लगभग तीन गुना बढ़ाकर 7,000 करोड़ रुपये से ज्यादा करने की तैयारी कर रहा है। इसका मकसद इस क्षेत्र में घरेलू उत्पादन बढ़ाना और चीन के प्रभुत्व वाले इस सेक्टर में अपनी मजबूत पकड़ बनाना है।
कैबिनेट की मंजूरी का इंतजार
सूत्रों के अनुसार, यह प्रस्ताव अभी कैबिनेट की मंजूरी का इंतजार कर रहा है। पहले लगभग 290 मिलियन डॉलर की योजना बनाई गई थी, लेकिन अब यह उससे कहीं बड़ा कदम होगा। इस योजना का उद्देश्य इलेक्ट्रिक वाहनों, नवीकरणीय ऊर्जा और रक्षा क्षेत्र के लिए जरूरी सामग्री उपलब्ध कराना है। सूत्रों का कहना है कि यह जानकारी अभी सार्वजनिक नहीं है, इसलिए उनकी पहचान उजागर न की जाए। उन्होंने यह भी बताया कि अंतिम फंडिंग राशि में आगे बदलाव हो सकता है।
भारत कई देशों के साथ मिलकर रेयर अर्थ मैग्नेट की सप्लाई चेन मजबूत बनाने की कोशिश कर रहा है। इसकी वजह यह है कि चीन, जो दुनिया के लगभग 90% रेयर अर्थ मैग्नेट को प्रोसेस करता है, ने अमेरिका से व्यापार विवाद के दौरान अप्रैल में अपने निर्यात नियम और सख्त कर दिए थे। इससे ऑटोमोबाइल कंपनियों सहित कई उद्योगों को सप्लाई की दिक्कतें हुईं। साल की शुरुआत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि जरूरी खनिजों का इस्तेमाल किसी हथियार की तरह नहीं होना चाहिए। उन्होंने स्थिर और विविध ग्लोबल सप्लाई चेन बनाने पर जोर दिया था, ताकि दुनिया ऐसी सप्लाई समस्याओं से बच सके।
दक्षिण एशिया में भारत का रेयर अर्थ उत्पादन बढ़ाने का प्लान दुनिया की उस कोशिश से जुड़ा है, जिसमें चीन पर निर्भरता कम करने पर जोर दिया जा रहा है। हालांकि, इस योजना के सामने कई चुनौतियाँ भी हैं — जैसे सीमित फंड, कम विशेषज्ञ लोग और इन प्रोजेक्ट्स को पूरा होने में लंबा समय लगना। अभी देश में रेयर अर्थ का उत्पादन बिना सरकारी मदद के फायदेमंद नहीं माना जाता, इसलिए सरकारी कंपनियाँ विदेशों में खनन साझेदारी करने की कोशिश कर रही हैं। इसके अलावा, इस क्षेत्र की ज़्यादातर उन्नत तकनीक अभी भी चीन के पास है। रेयर अर्थ की खान से आर्थिक रूप से सही तरीके से खनन करना भी मुश्किल होता है। साथ ही, इन खनिजों में रेडियोएक्टिव तत्व होते हैं, जिसके कारण पर्यावरण को भी खतरा हो सकता है।
सूत्रों ने बताया कि सरकार की यह योजना प्रोडक्शन-लिंक्ड प्रोत्साहन और कैपिटल सब्सिडी के जरिए लगभग पांच कंपनियों को मदद देगी। उन्होंने कहा कि चीन ने हाल ही में भारत में रेयर अर्थ मैग्नेट भेजने के लिए कुछ लाइसेंस जारी किए हैं, लेकिन इनमें से कोई भी भारतीय कंपनियों को नहीं मिला है। भारी उद्योग मंत्रालय के एक प्रवक्ता से इस मामले पर प्रतिक्रिया मांगी गई, लेकिन रविवार तक उनका जवाब नहीं मिला।
सूत्रों के अनुसार, सरकार सिंक्रोनस रिलक्टेंस मोटर्स पर रिसर्च के लिए भी फंड दे रही है। यह ऐसी तकनीक है, जो आगे चलकर रेयर अर्थ मटीरियल पर निर्भरता कम करने में मदद कर सकती है। उन्होंने बताया कि कई विदेशी कंपनियों ने भारत को रेयर अर्थ मटीरियल सप्लाई करने में रुचि दिखाई है। भारत की सालाना जरूरत करीब 2,000 टन ऑक्साइड मानी जाती है, जिसे दुनिया के बड़े उत्पादक आसानी से उपलब्ध करा सकते हैं।
भारत को उम्मीद है कि यह बड़ा इंसेंटिव प्रोग्राम दुनिया की मैग्नेट बनाने वाली कंपनियों को यहां अपनी यूनिट या साझेदारी शुरू करने के लिए आकर्षित करेगा। इससे चीन से आने वाले मैग्नेट पर निर्भरता कम होगी, क्योंकि चीन इस क्षेत्र में भारी सब्सिडी और कम दामों के जरिए बाज़ार पर कब्जा रखता है। हालांकि, अगर चीन ने अमेरिका और यूरोपीय यूनियन के लिए जो निर्यात नियमों में ढील दी है, वही सुविधा भारत को भी दे दी, तो भारत की योजना को चुनौती मिल सकती है। ऐसे में चीन के मैग्नेट दुनिया में सस्ते और आसानी से उपलब्ध हो जाएंगे, जिससे भारत में इस नए उद्योग में लंबे समय के निवेश धीमे पड़ सकते हैं।