India-US Trade Deal: भारत और अमेरिका के बीच हुए अंतरिम व्यापार समझौते की शर्तों ने आर्थिक गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत 5 साल में $500 अरब (करीब ₹42 लाख करोड़) का अमेरिकी सामान खरीदने के अपने वादे को पूरा कर पाएगा? वैसे दोनों देशों के बीच हुआ यह समझौता कोई 'दबाव' नहीं, बल्कि भारत की अपनी भविष्य की जरूरतों को अमेरिका की ओर मोड़ने का एक 'रणनीतिक दांव' है। आंकड़े गवाह हैं कि भारत जिन चीजों पर यह पैसा खर्च करने वाला है, वे वैसे भी हमारी विकास यात्रा के लिए अनिवार्य थीं।
भारत का सालाना आयात बिल लगभग $720 अरब है। अब इस डील के तहत भारत को हर साल करीब $100 अरब का सामान अमेरिका से खरीदना होगा। यह सुनने में भारी लगता है, लेकिन इसे तीन बड़े हिस्सों में समझा जा सकता है:
पेट्रोलियम और कच्चा तेल: भारत पहले से ही अमेरिका से $12-14 अरब का तेल खरीद रहा है। रूस से दूरी बनाने की शर्त के बाद यह आंकड़ा बढ़कर $30-35 अरब तक जा सकता है।
एयरक्राफ्ट: भारतीय एयरलाइंस को 2042 तक 2,200 विमानों की जरूरत है। हर साल लगभग 150 विमान खरीदे जाएंगे। अगर बोइंग को इसका बड़ा हिस्सा मिलता है, तो सालाना $20-25 अरब अकेले इसी सेक्टर से आएंगे।
AI और डेटा सेंटर्स: केन्द्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव के मुताबिक, भारत में AI इंफ्रास्ट्रक्चर पर $200 अरब का निवेश होना है। अमेरिकी टेक दिग्गजों Nvidia और Microsoft के साथ मिलकर बनने वाले जॉइंट वेंचर्स के जरिए $50 अरब सालाना का आयात और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर मुमकिन है।
खेती-किसानी पर क्या होगा असर?
विपक्ष और किसान संगठनों की चिंताओं के बीच वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने स्पष्ट किया है कि 'सेंसिटिव' सेक्टर जैसे डेयरी और मुख्य अनाज को छुआ भी नहीं गया है। अमेरिका से जो आयात होगा, वह मुख्य रूप से पशु आहार (DDG), रेड सोरघम और बादाम जैसे नट्स तक सीमित है। भारत का आम किसान ये चीजें बड़े पैमाने पर नहीं उगाता। इसके विपरीत, भारत के लिए अमेरिका ने अपने दरवाजे मसाले, चाय, कॉफी, आम और एवोकैडो जैसे उत्पादों के लिए खोल दिए है। यह सौदा भारतीय किसानों के लिए 'जीरो रिस्क' और 'हाई प्रॉफिट' वाला नजर आ रहा है।
न्यूक्लियर पावर और 'शांति' एक्ट का जादू
भारत अब 'फॉसिल फ्यूल' से 'क्लीन एनर्जी' की ओर बढ़ रहा है। अमेरिका में पारित SHANTI Act के बाद भारत के परमाणु ऊर्जा बाजार में अमेरिकी निवेश और Small Modular Reactors (SMR) की तकनीक आने का रास्ता साफ हो गया है। मशीनरी और न्यूक्लियर रिएक्टर्स का $60 अरब का सालाना मार्केट अब धीरे-धीरे अन्य देशों से हटकर अमेरिका की ओर शिफ्ट होगा। इससे न केवल हमें बिजली मिलेगी, बल्कि उच्च स्तर की तकनीक भी भारत आएगी।
इस पूरी डील का लब्बोलुआब यह है कि भारत ने केवल उन्हीं चीजों को खरीदने का वादा किया है, जिन्हें वह वैसे भी कहीं न कहीं से खरीदने ही वाला था। फायदा यह हुआ कि इसके बदले भारत को कपड़ा, रत्न-आभूषण और फार्मा सेक्टर में कम टैरिफ की सुविधा मिल गई, जिससे हमारे एशियाई पड़ोसियों के मुकाबले भारतीय सामान अमेरिका में सस्ता बिकेगा। यह डील केवल व्यापार नहीं, बल्कि भारत को FDI और आधुनिक तकनीक का ग्लोबल हब बनाने की एक सोची-समझी बिसात है।
(यह लेख डॉ. विकास वी. गुप्ता ने लिखा है जो ओमनीसाइंस कैपिटल के सीईओ और मुख्य निवेश रणनीतिकार है।)