S&P ग्लोबल रेटिंग्स का कहना है कि अगर मध्य-पूर्व संघर्ष के चलते ऊर्जा संकट बना रहता है और 2026 में कच्चे तेल की औसत कीमत 130 डॉलर प्रति बैरल पर रहती है, तो वित्त वर्ष 2027 में भारत की इकोनॉमिक ग्रोथ रेट 0.8 फीसदी तक धीमी हो सकती है। इस ग्लोबल रेटिंग एजेंसी की राय है कि अगर तेल की ऊंची कीमतें और आपूर्ति में रुकावटें लंबे समय तक बनी रहती हैं, तो वित्त वर्ष 2027 में भारत की GDP ग्रोथ रेट उसके 7.1 फीसदी के बेस-केस अनुमान से नीचे गिर सकती है।
S&P ग्लोबल का मानना है कि स्ट्रेस सिनेरियो में 2026 में तेल की औसत कीमत 130 डॉलर प्रति बैरल और 2027 में लगभग 100 डॉलर प्रति बैरल रहेगी। इसकी तुलना में बेस केस में 2026 के बाकी समय में कच्चे तेल की कीमत 85 डॉलर प्रति बैरल और 2027 में 70 डॉलर प्रति बैरल रह सकती है।
S&P की राय है कि तेल-गैस की कीमतों में बढ़त से घरों, कंपनियों और बैंकों पर बोझ बढ़ेगा। साथ ही सरकार के राजकोषीय मजबूती के प्रयास में भी मुश्किल होगी। हालांकि, उसका यह भी कहना है कि ईंधन की कीमतों में अचानक उछाल से उपभोक्ताओं को बचाने के लिए उठाए गए कदमों के कारण पब्लिक फाइनेंस में आने वाली कोई भी गिरावट अस्थाई होगी।
निगेटिव जोखिमों के बावजूद, भारत के मैक्रोइकोनॉमिक और फाइनेंशियल फंडामेंटल्स इतने मज़बूत हैं कि वे किसी भी झटके को झेल सकें। इससे सरकार, बैंकों या रेटेड कॉर्पोरेट्स की क्रेडिट गुणवत्ता पर तत्काल कोई असर पड़ने की उम्मीद नहीं है।
इंडिया इंक को लेकर S&P का अनुमान है कि टॉप 100 लिस्टेड फर्मों का EBITDA पिछली उम्मीदों के मुकाबले 25 प्रतिशत तक गिर सकता है, जबकि डेट-टू-EBITDA से मापा जाने वाला लेवरेज, FY27 में दोगुना हो सकता है। FY28 में कॉर्पोरेट क्रेडिट क्वालिटी में तेज सुधार हो सकता है। इस अवधि में एनर्जी की कीमतें ऊंची बनी रहेंगी, लेकिन 2026 के मुकाबले में कम रहेंगी।
बैंकिंग सेक्टर के बारे में S&P ने कहा कि बैंक अनिश्चितता के दौर में मज़बूत स्थिति के साथ प्रवेश कर रहे हैं। इनको एक दशक के हाई कैपिटल एडिक्वेसी और कई सालों के न्यूनतम स्तर पर दिख रहे नॉन-परफ़ॉर्मिंग लोन का सहारा मिला है। अगले 12–24 महीनों में क्रेडिट लॉस थोड़ा बढ़कर 0.9 फीसदी तक पहुंच सकता है, लेकिन कुल मिलाकर एसेट क्वालिटी के हेल्दी बने रहने की उम्मीद है।
S&P का अनुमान है कि मिडिल-ईस्ट संघर्ष की तीव्रता जल्द ही अपने चरम पर पहुंच जाएगी और होर्मुज़ स्ट्रेट से जुड़ी बाधाएं अप्रैल में ही कम हो जाएंगी। हालांकि, सप्लाई से जुड़ी कुछ परेशानियां कई महीनों तक बनी रह सकती हैं।
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