Experts view : US-ईरान तनाव के चलते बाजार पर छाए संकट के बादल, फिर भी इन सेक्टरों में दिख रहे निवेश के अच्छे मौके
Omniscience के विकास गुप्ता का कहना है कि अगर तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं या इसकी सप्लाई में रुकावट आती है, तो महंगाई बढ़ने की संभावना बनी रहेगी और US फेड और RBI ब्याज दरें बढ़ाने की सोच सकते हैं
Market Outlook: ओम्नीसाइंस कैपिटल विकास गुप्ता का कहना है कि अगर पश्चिम एशिया की स्थिति सामान्य हो जाती है तो एशियाई बाज़ारों, जिनमें भारत भी शामिल है, में FII का ज़ोरदार निवेश आएगा
ओम्नीसाइंस कैपिटल (OmniScience Capital) के CEO और चीफ इन्वेस्टमेंट स्ट्रेटेजिस्ट विकास गुप्ता को पूरे फाइनेंशियल सेक्टर में निवेश के बड़े अवसर नज़र आ रहे हैं। Nifty 500 में इस सेक्टर की हिस्सेदारी करीब 31 फीसदी है। इस स्पेस में उनको PSU और निजी बैंक, छोटे बैंक, हाउसिंग फाइनेंस कंपनियां और डाइवर्सिफाइड फाइनेंशियल सर्विसेज कंपनियां पसंद है। इन पर वह ओवरवेट भी है। इसके अलावा, उनको पावर कंपनियां, उपकरण बनाने वाली कुछ कंपनियां, पावर सेक्टर में काम करने वाली EPC कॉन्ट्रैक्ट लेने वाली कंपनियां और स्पेशलाइज्ड पावर फाइनेंस कंपनियां भी पसंद हैं।
अमेरिका-ईरान वार्ता के बारे में आपकी क्या राय है?
अमेरिका और ईरान की मांगों के बीच सचमुच एक बहुत बड़ी "खाई" है। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने एनरिच्ड यूरेनियम को छोड़कर एक गैर-परमाणु देश बन जाए। जबकि, ईरान का लक्ष्य एक परमाणु शक्ति बनना है। इसके पास पहले से ही बड़ी मात्रा में एनरिच्ड यूरेनियम मौजूद है। अमेरिका चाहता है कि होर्मुज़ स्ट्रेट में आवाजाही पूरी तरह से स्वतंत्र हो, जबकि ईरान उस पर अपना नियंत्रण स्थापित करना चाहता है और उससे टोल वसूलना चाहता है।
इन विरोधाभासी बातों को देखते हुए ऐसा लगता है कि इस समस्या का जल्द समाधान मुश्किल है। इसका मतलब यह भी हो सकता है कि हर पक्ष कुछ समय लेने की कोशिश कर रहा है और युद्ध फिर से शुरू हो सकता है।
इसके अलावा, यह भी ध्यान रखें कि तेल और गैस की सप्लाई में रुकावट से US को फ़ायदा हो सकता है, क्योंकि उसके पास तेल और गैस दोनों का भारी रिजर्व मौजूद है। तेल की कीमतें ज़्यादा होने पर शेल तेल का उत्पादन फ़ायदेमंद हो जाता है। इसलिए, मौजूदा हालात US के तेल उत्पादकों के लिए बहुत ज़्यादा बुरे नहीं हैं। थोड़े में कहें तो, ऐसा नहीं लगता कि US को युद्ध को पूरी तरह से रोकने की कोई जल्दी है।
मध्य-पूर्व के इस संघर्ष में कौन सा देश विजेता के रूप में उभरने की संभावना रखता है? क्या आपको लगता है कि संबंधित पक्षों ने अपने लक्ष्य हासिल कर लिए हैं?
किसी एक स्पष्ट विजेता का नाम बताना मुश्किल है। इससे एक तरफ तो अमेरिका को एनर्जी एक्सपोर्ट बढ़ने का फ़ायदा मिल सकता है। लेकिन, कुल मिलाकर इस लड़ाई से वैश्विक सप्लाई चेन में आई रुकावट से अमेरिका कोई खास फायदा होने की संभावना नहीं है। इससे रूसी तेल और गैस के निर्यात को बढ़ावा मिलत रहा है। लेकिन रूस को होने वाला भुगतान गैर-USD करेंसीज में किया जाता है। इससे कुल व्यापार निपटान गैर-USD करेंसीज में करने को बढ़ावा मिलता है। ऐसे में लंबे समय में इससे अमेरिकी डॉलर को नुकसान हो सकता है।
मध्य-पूर्व के देश जिनमें इज़राइल, सऊदी अरब, कतर वगैरह और ईरान शामिल ,सभी बड़े विनाश का सामना कर रहे हैं। इनमें से किसी का भी भला नहीं हो रहा है। कुल मिलाकर, कोई भी स्पष्ट विजेता नज़र नहीं आता। बल्कि, हर कोई किसी न किसी हद तक हारा हुआ ही है।
क्या आपको लगता है कि हाल ही में हुई तेज़ रिकवरी को देखते हुए, बाज़ारों ने इस संघर्ष के सबसे बुरे असर को पचा लिया है? अगर ऐसा है, तो क्या आपको इस साल डबल डिजिट रिटर्न मिलने की उम्मीद है?
अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि संघर्ष का सबसे बुरा दौर बीत गया है। एक संभावना यह हो सकती है कि युद्धविराम की तारीख खत्म होने के बाद, कुछ हफ़्तों के लिए बड़े पैमाने पर संघर्ष फिर से शुरू हो जाए। दूसरी संभावना यह है कि युद्ध लंबे समय तक धीमी गति से चलता रहे।
तीसरी स्थिति यह हो सकती है कि सभी पक्ष कुछ समय के लिए शांत हो जाएं और अपनी सामान्य दिनचर्या पर लौट आएं। हालांकि, इसका अर्थ यह होगा कि होर्मुज़ स्ट्रेट पर वास्तव में ईरानियों का नियंत्रण हो जाएगा और वे शायद न्यूट्रल देशों से टोल लेना जारी रखें और इस रूट से आवाजाही न होने दें।
क्या आपको लगता है कि नियर टर्म में वोलैटिलिटी बने रहने के बावजूद, अब वैल्यूएशन सही हैं?
इस समय बाजार में कई ऐसे शेयर हैं जिनकी कीमत उनके अनुमानित वास्तविक मूल्य (intrinsic value) से काफी कम है। 3-5 साल के नज़रिए से देखें तो, अर्थव्यवस्था और कंपनियां या तो किसी लंबे समय तक चलने वाले युद्ध और कीमतों व आपूर्ति पर उसके असर के हिसाब से खुद को ढाल लेंगी, या फिर युद्ध समाप्त हो जाएगा और हालात सामान्य हो जाएंगे। दोनों ही स्थितियों में लंबी अवधि के निवेशक के लिए स्थितियां अनुकूल हैं।
इस संघर्ष के चलते हुए करेक्शन और उसके बाद की रिकवरी में कौन से सेक्टर सबसे बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं?
इस नजरिए से पूरा फाइनेंशियल सर्विसेज़ सेक्टर बहुत अच्छा दिख रहा। Nifty 50 में इसकी लगभग 36 प्रतिशत और Nifty 500 में 31 प्रतिशत हिस्सेदारी है। इस सेक्टर के भीतर कई सब-सेक्टर हैं, जो अपने ग्रोथ ड्राइवर्स के मामले में काफी डाइवर्सिफाइड हैं। इस सेक्टर में भी PSU और प्राइवेट बैंक, छोटे बैंक, हाउसिंग फाइनेंस कंपनियां और डाइवर्सिफाइड फाइनेंशियल सर्विसेज़ कंपनियां सबसे अच्छी लग रही हैं। इसके अलावा पावर कंपनियां, उपकरण बनाने वाली कुछ कंपनियां, पावर सेक्टर में काम करने वाली EPC कॉन्ट्रैक्ट लेने वाली कंपनियां और स्पेशलाइज्ड पावर फाइनेंस कंपनियां भी पसंद हैं।
अगर पश्चिम एशिया की स्थिति सामान्य हो जाती है, तो क्या आपको उम्मीद है कि एशियाई बाज़ारों, जिनमें भारत भी शामिल है, में FII का ज़ोरदार निवेश आएगा?
हां, ऐसा होने पर FPI के निवेश के लिए बहुत ही अच्छा माहौल बनेगा। इससे आम तौर पर पूरे एशिया और खास तौर पर भारत के लिए मैक्रो-इकोनॉमिक हालात बहुत ही फ़ायदेमंद हो जाएंगे। इसके अलावा, अब वैल्यूएशन भी पहले के मुकाबले सस्ते हैं। इस वजह से FPIs भारत में दोबारा निवेश करने के लिए आकर्षित होंगे।
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