Judicial backlog: अदालतों में लंबित मामलों का बढ़ता बोझ! सुप्रीम कोर्ट में 10,000 से अधिक केस एक दशक से पेंडिंग, हाईकोर्ट में 80,660 केस 30+ सालों से लंबित

Judicial backlog: केंद्र ने राज्यसभा को बताया कि सुप्रीम कोर्ट में एक दशक से अधिक समय से 10,000 से ज्यादा केस पेंडिंग हैं। जबकि देश की तमाम हाई कोर्ट में 80,660 केस 30 साल से अधिक समय से अनसुलझे हैं। इससे देश भर में न्यायिक बैकलॉग का लेवल पता चलता है

अपडेटेड Aug 03, 2026 पर 12:19 PM
Judicial backlog: देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट में 10,000 से अधिक केस एक दशक से पेंडिंग हैं

Judicial backlog in india: केंद्र सरकार ने राज्यसभा को बताया कि सुप्रीम कोर्ट में एक दशक से अधिक समय से 10,000 से ज्यादा केस पेंडिंग हैं। जबकि देश की तमाम हाई कोर्ट में 80,660 केस 30 साल से अधिक समय से अनसुलझे हैं। इससे देश भर में न्यायिक बैकलॉग का लेवल पता चलता है। एक लिखित जवाब में केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने बताया कि देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट में अभी 96,000 से ज्यादा केस पेंडिंग हैं।

इनमें से 10,000 से ज्यादा केस 10 साल से अधिक समय से पेंडिंग हैं। मंत्री ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट में 558 केस 20 साल से ज्यादा समय से अनसुलझे हैं। जबकि 26 केस तीन दशक से अधिक समय से पेंडिंग हैं। नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड (NJDG) पर मौजूद डेटा के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट, देश के 25 हाई कोर्ट और डिस्ट्रिक्ट और सबऑर्डिनेट कोर्ट में 5.64 करोड़ से ज्यादा केस पेंडिंग हैं।

हाई कोर्ट में दशकों पुराने पेंडिंग केस


ज्यूडिशियल बैकलॉग के लेवल पर रोशनी डालते हुए मेघवाल ने बताया कि हाई कोर्ट में 80,660 केस 30 साल से ज्यादा समय से पेंडिंग हैं। ज्यूडिशियल सिस्टम में देरी पर एक सवाल का जवाब देते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि केस का निपटारा पूरी तरह से ज्यूडिशियरी के अधिकार क्षेत्र में आता है और एग्जीक्यूटिव कोर्ट को केस तय करने के लिए टाइमलाइन तय नहीं करता है।

उन्होंने कहा कि पेंडिंग केस कई वजहों से चलते हैं, जिसमें केस की कॉम्प्लेक्सिटी, सबूतों का नेचर और वकीलों, इन्वेस्टिगेशन एजेंसियों, गवाहों और लिटिगेंट जैसे स्टेकहोल्डर्स का कोऑपरेशन शामिल है।

वैकेंसी और इंफ्रास्ट्रक्चर से देरी 

मेघवाल ने कहा कि समय पर निपटारा जजों, ज्यूडिशियल ऑफिसर्स, कोर्ट स्टाफ और सही इंफ्रास्ट्रक्चर की मौजूदगी के साथ-साथ प्रोसीजरल नियमों के असरदार तरीके से लागू होने पर भी निर्भर करता है। टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक खाली जगहों को भरने के लिए तेजी से काम किया है। लेकिन हाई कोर्ट और निचली अदालतों में कमी बनी हुई है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि देश के 25 हाई कोर्ट में जजों की मंजूर 1,122 सीटों के मुकाबले 341 सीटें खाली हैं। जबकि निचली अदालतों में जजों के 30,868 अधिकारियों की मंजूर सीटों के मुकाबले 7,311 सीटें खाली हैं।

देशभर में 5.64 करोड़ से ज्यादा मामले लंबित

मंत्री ने बताया कि नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड (NJDG) के आंकड़ों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट, देश के 25 हाईकोर्टों तथा जिला एवं निचली अदालतों को मिलाकर 5.64 करोड़ से अधिक मामले अभी भी लंबित हैं। यह आंकड़ा देश की न्यायिक प्रणाली पर बढ़ते दबाव को दर्शाता है।

सरकार ने बताई देरी की वजह

न्यायिक मामलों में देरी को लेकर पूछे गए सवाल के जवाब में कानून मंत्री ने कहा कि मामलों का निपटारा पूरी तरह न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र का विषय है। सरकार अदालतों के लिए किसी प्रकार की समय-सीमा तय नहीं करती। उन्होंने कहा कि मामलों के लंबित रहने के पीछे कई कारण हैं, जिनमें मामलों की जटिलता, साक्ष्यों की प्रकृति, वकीलों, जांच एजेंसियों, गवाहों और पक्षकारों का सहयोग शामिल है।

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