Left Front Collapse: जैसे-जैसे केरल विधानसभा चुनाव की सियासी तस्वीर साफ हो रही है, भारत की राजनीति में एक बड़े ऐतिहासिक बदलाव को होते हुए भी देख रही है। चुनाव आयोग के ताजा रुझानों के अनुसार, केरल में मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के नेतृत्व वाले एलडीएफ (LDF) को करारी हार का सामना करना पड़ रहा है। यह पिछले पांच दशकों में पहली बार होगा जब भारत के किसी भी राज्य में कोई कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री नहीं होगा।
केरल में ढह गया वामपंथ का आखिरी किला
2016 से सत्ता में काबिज पिनराई विजयन सरकार वामपंथ का आखिरी गढ़ मानी जा रही थी। दोपहर 2 बजे तक के रुझानों के अनुसार-
यूडीएफ (UDF): कांग्रेस के नेतृत्व वाला गठबंधन 89 सीटों पर बढ़त के साथ बहुमत की ओर है।
एलडीएफ (LDF): सत्ताधारी वाम मोर्चा मात्र 39 सीटों पर सिमटता दिख रहा है।
10 साल की एंटी-इंकंबेंसी (सत्ता विरोधी लहर) ने वामपंथ के इस अंतिम गढ़ को भी ध्वस्त कर दिया है।
पश्चिम बंगाल में भी हाल बेहाल
1977 से 2011 तक लगातार 34 साल बंगाल पर राज करने वाले वाम मोर्चे का हाल यहां भी बुरा है। 294 सदस्यीय विधानसभा में वाम मोर्चा मात्र 2 सीट पर आगे चल रहा है। राज्य में भाजपा के उभार ने वामपंथ के वोट बैंक को पूरी तरह अपनी ओर खींच लिया है, जिससे बंगाल में लेफ्ट का वजूद लगभग खत्म होने को है।
2004 से अब तक: लगातार गिरावट का सफर
वामपंथ की यह गिरावट अचानक नहीं हुई है, बल्कि पिछले दो दशकों से यह ग्राफ लगातार नीचे गिर रहा है-
2004 लोकसभा: वाम दलों ने 59 सीटें जीतकर यूपीए सरकार बनाने में बड़ी भूमिका निभाई थी।
2009 लोकसभा: सीटें घटकर 24 रह गईं।
2014 लोकसभा: केवल 10 सीटें बचीं।
2019 लोकसभा: आंकड़ा सिमटकर 5 पर आ गया। वर्तमान में उनके पास केवल 6 लोकसभा सीटें हैं।
लेफ्ट की राजनीति क्यों ढलान पर?
भारत की सियासत में कभी काफी मजबूत रहे और गरीबों की राजनीति के लिए मशहूर लेफ्ट पार्टियों का ये हाल आखिर कैसे हो गया। इस सवाल को कुछ बिंदुओं में समझा जा सकता है-
नेतृत्व का अभाव: पार्टी में युवा और ऊर्जावान नेतृत्व की भारी कमी देखी गई है।
विचारधारा का टकराव: वैश्वीकरण और निजीकरण जैसे मुद्दों पर स्पष्ट और आधुनिक वैचारिक रुख अपनाने में विफलता।
जनाधार का खिसकना: वाम दल अपने पारंपरिक आधार मजदूरों और श्रमिकों को एकजुट रखने में नाकाम रहे हैं।
शायद यही वजह है कि 2011 में बंगाल, 2018 में त्रिपुरा और अब 2026 में केरल की सत्ता गंवाने के बाद कम्युनिस्ट पार्टियां भारत के बदलते राजनीतिक परिदृश्य में अप्रासंगिक होने की कगार पर पहुंच गई हैं।